4-Panwar Dynasty of Garhwal

 

पंवार वंश (Panwar Dynasty)

कत्यूरी वंश के पतन के पश्चात् यदि पंवार (Panwar) कालीन गढ़वाल की बात की जाय तो सर्व प्रमुख यह उभरकर आता है कि वहाँ पंवार वंश (Panwar dynasty) का विस्तार किस प्रकार हुआ? क्योंकि पंवार वंश (Panwar dynasty) से पूर्व गढ़वाल सहित समूचे उत्तराखण्ड में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल था। क्षेत्र छोटी-छोटी राजनीतिक इकाईयों में बंटा हुआ था। उस बिखराव के मध्य एक महत्वपूर्ण राजनीतिक इकाई चाँदपुर गढ़ी में पंवार शासकों की भी थी। जिसने आगे चलकर गढ़वाल में एक संगठित राज्य की स्थापना की थी। 

चाँदपुर गढ़ी में पंवार वंश का संस्थापक शासक कनकपाल उसके उत्तराधिकारियों ने अपने राज्य का सीमा विस्तार किया। एक ओर गढ़वाल में लगभग 52 गढ़ियों का बोलबाला था, दूसरी ओर बार-बार कुमाऊँ के शासकों द्वारा चाँदपुर गढ़ी पर आक्रमण किये जा रहे थे। इस अस्थिरता के मध्य पंवार शासकों ने दोनों संकट आन्तरिक वाह्य का सामना करते हुए गढ़वाल की सभी छोटी-छोटी ठकुराईयों को पराजित कर गढ़वाल को एक सूत्र में बाँधा तथा राजधानी चाँदपुर गढ़ी से स्थानान्तरित कर गढ़वाल क्षेत्र के मध्य स्थान अलकनन्दा नदी के किनारे श्रीनगर में स्थापित की थी।

1804 तक पंवार शासकों (Panwar dynasty) ने अपनी सत्ता का संचालन किस प्रकार किया था तथा गढ़वाल में स्थिरता स्थापित कर एक स्थायी राजनीतिक, सामाजिक सांस्कृतिक, न्यायिक आर्थिक ढाँचा भी स्थापित किया था, जो गोरखों के आगमन तक चलता रहा था।

गढ़वाल में पंवार वंश की स्थापना
(Establishment of Panwar Dynasty in Garhwal)

कत्यूरी अवसान के पश्चात् जब गढ़वाल में बहुराजकता का काल आरम्भ हुआ तो गढ़वाल क्षेत्र छोटी-छोटी इकाईयों में बंट गया था कहा जाता है तब गढ़वाल में 52 गढ़िया या किले स्थापित थे उनका संचालन छोटे-छोटे राजा कर रहे थे, उन्हीं इकाईयों में से चाँदपुर गढ़ी का पंवार राजवंश भी एक था। इस वंश के शासकों ने धीरे-धीरे गढ़वाल के छोटे-छोटे सामंतों राजाओं को पराजित कर गढ़वाल को एक सूत्र में बाँधकर गढ़ राज्य की स्थापना की थी। अर्थात सभी गढ़नरेशों को अपने अधीन कर लिया। अतः यहीं से पवांर वंश (Panwar dynasty) का विस्तार हुआ था। जिसने फिर गढ़वाल में 1804 . तक शासन किया था इस प्रकार चाँदपुर गढ़ी में पंवार वंश की स्थापना हुई थी।

कनकपाल (Kanakpal)

चाँदपुर गढ़ी में पंवार राजवंश (Panwar dynasty) के संस्थापक के सम्बन्ध में इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं जैसे- हार्डविक, विलियम्स, मौलाराम, हरिकृष्ण रतूड़ी, अटकिन्सन, डबराल, वैकेट, अल्मोड़ा सूची विभिन्न शिलालेख आदि। इन सभी मतों के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि पूर्वी गढ़वाल में स्थित चाँदपुर गढ़ी का शासक भानुप्रताप की दो पुत्रिया थी उसने ज्येष्ठ पुत्री का विवाह कुमाऊँ के राजकुमार राजपाल के साथ किया छोटी पुत्री का विवाह धारानगरी का राजकुमार कनकपाल जो तब हरिद्वार यात्रा पर आया था उसके साथ किया था तथा चाँदपुर गढ़ी कनकपाल को ही सौंपकर अपना बद्रिकाश्रम चले गया था। यहीं से कनकपाल ने पंवार वंश को आगे बढ़ाया। 

दूसरा मत यह भी है कि भिलंगना उपत्यको का राजा सोनपाल की पुत्री का विवाह कांदिल पाल से हुआ और दहेज में चाँदपुर गढ़ी मिलने के साथ ही इस वंश का उत्थान हुआ था। इन दोनों मतो में आधार स्वरुप साम्यता को देखते हुए ऐसा लगता है कि कनकपाल ही गढ़वाल के पंवार वंश (Panwar dynasty) का संस्थापक था क्योंकि गढ़वाल की जनश्रुतियों में भी अधिकांश कनकपाल का उल्लेख होता है। परन्तु कनकपाल से जगतपाल तक के शासकों के सम्बन्ध में किसी प्रकार के प्रमाण या विस्तृत जानकारी नहीं मिलती है अधिकांश श्रोतों के अनुसार गढ़वाल के पंवार राजवंश (Panwar dynasty) का इतिहास विस्तार के साथ अजयपाल के राज्यकाल से ही आरम्भ होता है।

वैकेट वंशावली (पंवार वंश की वंशावली)
(Lineage of Panwar Dynasty)

पंवार राजवंश (Panwar dynasty) के शासकों की अनेक विद्वानों द्वारा अलग-अलग वंशावलियाँ दी गई हैं जैसे- वैकेट, विलिम्स, अल्मोड़ा से प्राप्त वंशावली,मौलाराम सभासार में दी गई वंशावली, हुड़कियों द्वारा दी गई वशांवली आदि। इससे ऐसा लगता है कि कनकपाल ही इस वंश (Panwar dynasty) का संस्थापक था और अजयपाल के राजा बनने के पश्चात् पंवार राज्य (Panwar Stateका विस्तार हुआ। इसके अतिरिक्त सभी वंशावलियाँ आधार स्वरुप एक ही लगती हैं इनमें से यहाँ वैकेट द्वारा दी गई वंशावली इस प्रकार है 

रॉयल्टी

क्र.सं.

राजा का नाम

राज्यकाल

मृत्यु आयु

मृत्यु तिथि

1

कनकपाल

11

51

756

2

श्यामपाल

23

60

782

3

पाण्डुपाल

31

45

813

4

अविगत पाल

25

31

838

5

सीगलपाल

20

24

858

6

रतनपाल

49

69

907

7

सालीपाल

08

17

915

8

विधिपाल

20

20

935

9

मदन पाल

17

22

952

10

भक्तिपाल

25

31

977

11

जयचन्द्र पाल

29

36

1006

12

पृथ्वीपाल

24

40

1030

13

मदनपाल II

22

30

1052

14

अगस्तिपाल

20

33

1072

15

सुरतिपाल

22

36

1084

16

जयत सिंह पाल

19

30

1113

17

अनन्तपाल I

16

24

1129

18

आभदपाल I

12

20

1141

19

विभोगपाल

18

22

1159

20

सुमाजनपाल

14

20

1173

21

विक्रमपाल

15

24

1188

22

विचित्रपाल

10

23

1198

23

हंसा पाल

11

20

1209

24

सोन पाल

07

19

1216

25

कांदिलपाल

05

21

1221

26

कामदेवपाल

15

24

1236

27

सालखारी देव

18

30

1254

28

लखन देव

23

32

1277

29

अनन्तपाल II

21

29

1298

30

पूरब देव

19

33

1317

31

अभयदेव

07

21

1324

32

जयरामदेव

23

24

1347

33

असलदेव

09

21

1356

34

जगतपाल

12

19

1368

35

जीतपाल

19

24

1387

36

आन्नदपाल II

28

41

1415

37

अजयपाल

31

59

1446

38

कल्याण शाह

09

40

1455

39

सुन्दर पाल

15

35

1470

40

हंसदेवपाल

13

24

1483

41

विजयपाल

11

21

1494

42

सहजपाल

36

45

1530

43

बलभद्र शाह

25

41

1555

44

मानशाह

20

39

1575

45

स्यामशाह

09

31

1584

46

महिपत शाह

25

65

1609

47

पृथ्वीशाह

62

70

1671

48

मेदिनीशाह

46

62

1717

49

फतेशाह

48

51

1765

50

उपेन्द्रशाह

01

22

1766

51

प्रदीप शाह

63

70

1829

52

ललितशाह

08

30

1837

53

जफरत शाह

06

23

1843

54

प्रद्युम्न शाह

18

29

1861

उक्त वंशावली अन्य मतों के अनुसार यह कहा जा सकता है कि लगभग 888 . में कनकपाल ने ही चाँदपुर गढ़ी में पंवार वंश (Panwar dynasty) की स्थापना की थी जिसका विस्तार आगे चलकर उसके उत्तराधिकारियों ने किया तथा चाँदपुर गढ़ी से राजधानी देवलगढ़ फिर वर्तमान श्रीनगर गढ़वाल में स्थापित की थी। परन्तु अधिक जानकारी या वर्णन मिल पाने के कारण कनकपाल उसके उत्तराधिकरियों के बारे में विस्तारपूर्वक वर्णन करना सम्भव नहीं है अर्थात कनकपाल के बारे में छुट-पुट जानकारी के अतिरिक्त कुछ भी नहीं मिलता है। 

अजयपाल उसके आगे अन्तिम पंवार शासक प्रद्युम्न शाह तक विस्तार से जानकारी उपलब्ध है अजयपाल ने पंवार साम्राज्य का जिस प्रकार विस्तार किया उससे यह कहने में अतिसयोक्ति नहीं होगी कि अजयपाल ही पंवार वंश (Panwar dynasty) का वास्तवित संस्थापक था।

 अजयपाल उसका शासन काल

पंवार राजवंश (Panwar dynasty) के वास्तविक संस्थापक अजयपाल की राज्यारोहण की तिथि के सम्बन्ध में इतिहासकारों में मतभेद है। सभी ने भिन्न-भिन्न तिथियाँ दी हुई हैं जैसे सी. मैवलडफ, ओकले/गैरोला, अठकिन्सन, वैकेट, रतूड़ी डबराल आदि। इन सभी के द्वारा दी गई तिथियों का अध्ययन करने के पश्चात् ऐसा प्रतीत होता है कि अजयपाल का शासनकाल 1500 . से 1547 . के मध्य रहा होगा, इसी बीच उसने राजधानी परिवर्तन, राज्य विस्तार, शासन प्रबन्ध, वाहय राज्यों से सम्बन्ध अनेक निर्माण कार्य करवायें।

राज्यारोहण के पश्चात् जब अजयपाल चाँदपुर गढ़ी के सीमा विस्तार में प्रयासरत था तभी कुमाऊँ का चंद शासक कीर्तिचंद भी अपने राज्य विस्तार में प्रयत्नशील था। डोटी (नेपाल) नरेशों के विरुद्ध सफलता नही मिल पाने के कारण उसने गढ़वाल पर आक्रमण कर सफलता हासिल की थी। इस प्रकार कीर्तिचंद का सोर सीरा छोड़ पूरे कुमाऊँ पर अधिकर के साथ-साथ गढ़वाल राज्य के बड़े हिस्से पर भी अधिकार हो गया था।

कुछ समय पश्चात् कीर्तिचंद ने गढ़ (गढ़वाल) नरेश के साथ संधि कर उसका राज्य उसे लौटा दिया, परन्तु उसके एवज में गढ़ नरेश को कर देने हेतु बाध्य किया था जो कर राजा महिपत शाह से पूर्व तक के राजा कुमाऊँ नरेश को देते रहे थे। यद्यपि इस बात पर इतिहासकारों में मतभेद भी है।

अजयपाल का राज्य विस्तार/शासन प्रबन्ध

पंवार राज्य (Panwar State) की स्थापना से पूर्व गढ़ राज्य छोटी-छोटी इकाईयों में बंटा हुआ था। जिनके खण्डहर गढ़ (किले) वर्तमान में भी वहाँ मौजूद हैं। विविध मतानुसार यह माना जाता है कि अजयपाल ने गढ़वाल के 48 गढ़ियों के 48 राजाओं को परास्त कर गढ़राज्य का विस्तार किया था। तत्पश्चात् उसके उत्तराधिकारियों ने भी देहरादून, उत्तरकाशी वाले क्षेत्र तक गढ़ राज्य का विस्तार किया। परन्तु इस संगठित गढ़ राज्य का वास्तविक संस्थापक का श्रेय अजयपाल को ही दिया जा सकता है क्योंकि उसीने छोटी-छोटी राजनीतिक इकाईयों को जीतकर गढ़राज्य को स्थापित किया था। 

राजधानी

अजयपाल से पूर्व पंवार शासकों (Panwar dynasty) की राजधानी चॉदपुर गढ़ी में थी। कुमाऊँ नरेश कीर्तिचंद से पराजित होने पर पंवार शासकों (Panwar dynasty) ने अपनी राजधानी देवलगढ़ स्थानान्तरित की। सम्भवतः 1512 या उससे पूर्व में अजयपाल ने राजधानी देवलगढ़ से श्रीनगर परिवर्तित कीजो 1804 . तक राजधीन बनी रही। जिसका मूल कारण समतल भूमि गढ़राज्य का केन्द्र स्थल होना था।

निर्माण कार्य

अजयपाल द्वारा श्रीनगर में विशाल राजप्रासाद का निर्माण गढ़ी के रुप में करवाया था जिसके तीन मुख्य भाग थे। दरवाजे में कलाकृतियाँ संजोयी गई थी। निर्माण में पत्थरों का ही प्रयोग किया गया था। जैसे- खिड़की, दरवाजे आदि। पानी एवं अन्य सुविधाओं हेतु राजप्रासाद से अलकनंदा नदी तक सुरंग निर्माण भी करवाया गया था। चारों ओर उद्यान विकसित किये गये। परन्तु यह विरासत अब असतित्व में नहीं है क्योंकि 1803 के भूकम्प में यह ध्वस्त हो गया था। उसी के बराबर में अजयपाल द्वारा एक सभामण्डल का निर्माण भी करवाया गया था भैरव मंदिर राजराजेश्वरी के यन्त्र की स्थापना भी की थी। अनेक मूर्तियों का निर्माण भी करवाया गया जिनमें मुख्य शिव गौरी की मूर्तियाँ थी।

 

गढ़वाल के 52 गढ़
(52 Garh or Fort of Garhwal)

कत्यूरी अवसान के पश्चात् जब गढ़वाल में बहुराजकता का काल आरम्भ हुआ तो गढ़वाल क्षेत्र छोटी-छोटी इकाईयों में बंट गया था कहा जाता है तब गढ़वाल में 52 गढ़िया या किले स्थापित थे उनका संचालन छोटे-छोटे राजा कर रहे थे, उन्हीं इकाईयों में से चाँदपुर गढ़ी का पंवार राजवंश भी एक था। इस वंश के शासकों ने धीरे-धीरे गढ़वाल के छोटे-छोटे सामंतों राजाओं को पराजित कर गढ़वाल को एक सूत्र में बाँधकर गढ़ राज्य की स्थापना की थी।  

इतिहास

गढ़वाल के 52 गढ़ इस प्रकार हैं – 


1. चांदपुर गढ़

§  स्थान  चांदपुर

§  सम्बंधित जाति सूर्यवंशी रजा भानु प्रताप का

2. भरपूर गढ़

§  स्थान भरपूर

§  सम्बंधित जाति सजवाण जाति

3. कुजणी गढ़

§  स्थान कुजणी

§  सम्बंधित जाति सजवाण जाति

4. सिल गढ़

§  स्थान सिल गढ़

§  सम्बंधित जाति सजवाण जाति

5. मुंगरा गढ़

§  स्थान रंवाई

§  सम्बंधित जाति रावत जाति

6. नागपुर गढ़

§  स्थान – नागपुर

§  सम्बंधित जाति –  नाग जाति

7. कोल्लिगढ़

§  स्थान –  बछणस्यूं  

§  सम्बंधित जातिबछवाड़ बिष्ट

8. रावडगढ़  

§  स्थान – बद्रीनाथ के निकट

§  सम्बंधित जाति – रवाडी

9. फल्याण गढ़

§  स्थान – फल्दाकोट

§  सम्बंधित जाति – फल्याण जाति के ब्राह्मण

10. बांगर गढ़

§  स्थान – बांगर

§  सम्बंधित जाति – राणा

11. कुइली गढ़

§  स्थान –  कुइली

§  सम्बंधित जाति – सजवाण जाति

12. रैका गढ़

§  स्थान रैका

§  सम्बंधित जाति रमोला जाति

13. मौल्या गढ़

§  स्थान रमोली

§  सम्बंधित जाति रमोला जाति

14. उप्पू गढ़

§  स्थान उदयपुर

§  सम्बंधित जाति चौहान

15. सांकरी गढ़

§  स्थान रंवाई

§  सम्बंधित जाति राणा

16. रामी गढ़

§  स्थान शिमला

§  सम्बंधित जाति राणा

17. बिराल्टा गढ़

§  स्थान जौनपुर

§  सम्बंधित जाति रावत

18. इडिया गढ़

§  स्थान रंवाई बडकोट

§  सम्बंधित जाति – इडिया जाति

19. बाग गढ़

§  स्थान गंगा सलाणा

§  सम्बंधित जाति बागूड़ी जाति

20. गढ़कोट गढ़

§  स्थान मल्ला ढांगू

§  सम्बंधित जाति – बगडवाल

21. चौंडा गढ़

§  स्थान चांदपुर

§  सम्बंधित जाति चौन्दाल

22. तोप गढ़

§  स्थान चांदपुर

§  सम्बंधित जाति तोपाल जाति

23. राणी गढ़

§  स्थान राणी गढ़ पट्टी

§  सम्बंधित जाति तोपाल

24. श्रीगुरु गढ़

§  स्थान सलाण

§  सम्बंधित जाति परिहार

25. बधाण गढ़

§  स्थान बधाण

§  सम्बंधित जाति बधाणी जाति

26. लोहबाग गढ़

§  स्थान लोहबा

§  सम्बंधित जाति नेगी

27. रतन गढ़

§  स्थान कुजणी

§  सम्बंधित जाति – धमादा जाति

28. चौन्दकोट गढ़

§  स्थान चौन्दकोट

§  सम्बंधित जाति चौन्दकोट जाति

29. नयाल गढ़

§  स्थान कटूलस्यूं

§  सम्बंधित जाति नयाल

30. अजमीर गढ़

§  स्थान अजमेर पट्टी

§  सम्बंधित जाति पयाल जाति

31. गड़ताग गढ़

§  स्थान टकनौर

§  सम्बंधित जाति भोटिया जाति

32. कुंडारा गढ़

§  स्थान नागपुर

§  सम्बंधित जाति कुंडारी

33. लंगूर गढ़

§  स्थान लंगूर पट्टी

34. नाला गढ़

§  स्थान  देहरादून

35. दशोली गढ़

§  स्थान दशोली

36. धौना गढ़  

§  सम्बंधित जाति धौन्याल

37. एरासू गढ़

§  स्थान श्रीनगर के पास

38. बनगढ़ गढ़

§  स्थान बनगढ़

39. भरदार गढ़

§  स्थान भरदार

40. कांडा गढ़

§  सम्बंधित जाति रावत

41. सावली गढ़

§  स्थान सावली खाटली

42. गुजडू गढ़

§  स्थान गुजडू

43. जौट गढ़

§  स्थान जौनपुर

44. देवल गढ़

§  स्थान देवलगढ़

45. लोद गढ़

§  स्थान देवलगढ़

46. जौंलपुर गढ़

§  स्थान देवलगढ़

47. चंपा गढ़

§  स्थान देवलगढ़

48. डोडराक्वांरा गढ़  

§  स्थान देवलगढ़

49. भवना गढ़

§  स्थान देवलगढ़

50. लोदन गढ़

§  स्थान देवलगढ़

51. बदलपुर गढ़

§  स्थान बदलपुर

52. संगेला गढ़

§  सम्बंधित जाति संगेला जाति


पंवार वंश की प्रमुख शब्दावलियाँ 

इस से पहले हमें यहाँ पर पंवार वंश का इतिहासपंवार वंश की वंशावली के बारे में देख चुकें है। इस लेख में हम उत्तराखंड के पंवार वंश में प्रयुक्त होने वाली प्रमुख शब्दावलियाँ के बारे में जानेंगे  

 पंवार वंश में युवराज को कहा जाता था टीका

 पंवार वंश में राजा को कहा जाता था रजबार 

 पंवार वंश में राजा का सर्वोच्च अधिकारी होता था नरेश 

 पंवार वंश में राज्य का सर्वोच्च मंत्री को कहा जाता था मुखतार 

 पंवार वंश में परगना का प्रशासक को कहा जाता था थोकदार 

 पंवार वंश में परगना की सबसे छोटी इकाई होती थी पट्टी 

 पंवार वंश में बाँस और रिंगाल के बर्तन बनाने वाले को कहते थे रुड़िया 

 पंवार वंश में काष्ठ भाण्ड बनाने को कहा जाता था चिन्याल 

 पंवार वंश में वस्त्र सिलने वाले को कहा जाता था औजी/औझी 

 पंवार वंश में शराब बनाने वाले को कहा जाता था  कलाल 

 पंवार वंश में भूमि मापने की सबसे छोटी इकाई थी मुट्ठी 

 पंवार वंश में भूमि माप की सबसे बड़ी इकाई ज्यूला 

 पंवार कालीन टकसाल स्थित है श्रीनगर  

रॉयल्टी

 पंवार वंश में दस (10) टका होता था एक तिमासी 

 पंवार वंश में चालीस (40) टका होता था एक गढ़वाली रुपया

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