2-Uttrakhand History of Kunind

 

कुमाऊँ और गढ़वाल के नामों की उत्पत्ति का इतिहास

कुमाऊँ शब्द की उत्पत्ति

कुमाऊँ शब्द की उत्पत्ति में यह किंवदन्ति प्रचलित है कि पिथौरागढ़ जिले की चम्पावत तहसील मेंकानदेवनामक पहाड़ी पर भगवान ने कूर्म का रूप धारण कर तीन सहस्त्र वर्ष तक तपस्या की। हाहा, हूहू देवतागण तथा नारदादि मुनीश्वरों ने उनकी प्रशस्ति गाई। लगातार तीन सहस्त्र वर्षों तक एक ही स्थान पर खड़े रहने के कारण कूर्म भगवान के चरणों के चिन्ह पत्थर में अंकित हो गये जो अभी तक विद्यमान हैं। तब से इस पर्वत का नाम कूर्माचल हो गया- कूर्म+अचल (कूर्म जहाँ पर अचल हो गये थे) 

कूर्माचल का प्राकृत रूप बिगड़ते-बिगड़ते कुमू बन गया तथा यही शब्द बाद में कुमाऊँ में परिवर्तित हो गया। सर्वप्रथम यह नाम केवल चम्पावत तथा उसके समीपवर्ती गांवों को दिया गया किन्तु जब यहाँ चन्दों के राज्य की स्थापना हुई एवं उसका विस्तार हुआ तो कूर्माचल उस समग्र प्रदेश का नाम हो गया जो इस समय अल्मोड़ा, नैनीताल एवं पिथौरागढ़ में शामिल है। तत्कालीन मुस्लिम लोग चन्दों के राज्य को कुमायूं कहते थे और यही शब्द आजकल कुमाऊँ के रूप में प्रचलित है।

यद्यपि पुराणों में वर्णित कूर्म अवतार के कारण इस अंचल का नाम कुमाऊँ पड़ा या कूर्मांचल कहा गया किन्तु अर्वाचीन शिलालेखों, ताम्रपत्रों तथा प्राचीन ग्रन्थों से ज्ञात होता है कि कूर्माचल या कुमाऊँ दोनों शब्द बहुत बाद के हैं। सम्राट समुद्रगुप्त के प्रयाग-स्थित प्रशस्ति लेख में इस प्रान्त को (कार्तिकेयपुर) कहा गया है। तालेश्वर में उपलब्ध पाँचवीं तथा छठी शताब्दी के ताम्रपत्रों मेंकार्तिकेयपुरतथाब्रह्मपुरदोनों नामों का उल्लेख हुआ है। प्रसिद्ध पाण्डुकेश्वर वाले ताम्रपत्रों में केवलकार्तिकेयपुरशब्द आया है। किन्तु चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इसेब्रह्मपुरशब्द से सम्बोधित किया है।

डॉ. . बी. एल. अवस्थी ने अपनी पुस्तक स्टडीज इन स्कन्द पुराण भाग-1” में लिखा है कि गढ़वाल एवं कुमाऊँ को ही सम्मिलित रूप सेब्रह्मपुरपुकारा जाता था।

गढ़वाल शब्द की उत्पत्ति

गढ़वालशब्द परमारों की देन है। चौदहवीं शताब्दी में परमार वंश के ही एकदैदीप्तमाननक्षत्र राजा अजयपाल ने 52 छोटे-छोटे गढ़ों में विभक्त इस अंचल को एक सूत्र में पिरो दिया और स्वयं उस राज्य का एकछत्र स्वामी अर्थातगढ़वालाबना जिसका राज्य कहलाया गढ़वाल। डॉ. शिवप्रसाद डबराल कहते हैं। किगढ़वालशब्द का प्रयोग सर्वप्रथम इस स्थल के प्रसिद्ध चित्रकार श्री मोलाराम (सन् 1815) ने किया। श्री मुकन्दीलाल सन् 1743 से सन् 1833 तक श्री मोलाराम का काल मानते हैं, किन्तु ऐसा प्रतीत होता है किगढ़वालशब्द का उदय श्री मोलाराम से पूर्व हो चुका था, क्योंकि हिन्दी जगत के विख्यात कवि भूषण ने राजा फतेहशाह की प्रशस्ति में जो यशोगान किया था उसमेंगढ़वारशब्द स्पष्ट रूप से प्रयुक्त किया गया है

लोक ध्रुव लोक हूं ते ऊपर रहेगो भारी,
भानु ते प्रमानि को निधान आनि आनेगो।
सरिता सरिस सुर सरितै करैगो साहि,
हरि तै अधिक अधिपति ताहि मानैगो।।
अरध परारध लौ गिनती गनैगो गुनि,
बद ले प्रमाण सो प्रमान कछु जानैगो।
सुयश ते भली मुख भूषण भनैगो बाढि,
गढ़वार राज्य पर राज जो बखानैगो।। 

भौगोलिकसंदर्भ

इसके अतिरिक्त ठा. शूरवीर सिंह, पुराना दरबार, टिहरी संग्रह में एक ताम्रपत्र संवत 1757 अर्थात 1700 0 का इस प्रकार है, जिसमें गढ़वाल शब्द का प्रयोग किया गया है।

उत्तराखण्ड के आदि निवासी

प्रसिद्ध पाश्चात्य विद्वान ग्रियर्सन का मत है कि गढ़वाल तथा कुमाऊँ के आदि निवासी किरात थे। प्राचीन ग्रन्थों में पतित पावनी गंगा नदी एवं जगत माता दुर्गा, पार्वती को भीकिरातीनाम से सम्बोधित किया है। संस्कृतकृतथाअत्से किरात शब्द बना है। अतः स्पष्ट है कि यह किरात शब्द भौगोलिक नाम का द्योतक है। पर्वतीय क्षेत्र में गंगा की घाटियों के निवासी किरात कहलाते थे। चौथी सदी ईसा पूर्व के जग-विख्यात यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने अपनी रचना में इस क्षेत्र में किरात जाति का होना वर्णित किया है। 

महाभारत-सभापर्व अध्याय 4, वनपर्व अध्याय 51 तथा भीष्म-पर्व अध्याय 9 में किरात जाति के सम्बन्ध में सम्मानित वर्णन मिलता है। महाकवि कालिदास कृतरघुवंशमहाकाव्य के अध्याय 4/76 में इस पर्वतीय क्षेत्र में किरात निवासियों का वर्णन है।मत्स्य पुराणएवंमार्कण्डेय पुराणमें भी यहाँ के किरात राज्य एवं किरात भूमि का वर्णन आता है। महाकवि बाणभट्ट कृतकादम्बरीमें किरात लोगों का इस भूखण्ड में निवास होना लिखा है। प्राचीन भूगोल शास्त्रज्ञबाराहमिहिरने भी अपने ग्रन्थबाराही संहिताके अध्याय 14 में इन किरात लोगों का आवास बताया है।

महाभारत केवन-पर्व अध्याय 140’ में वर्णित है कि पाण्डवगण गन्धमादन पर्वत (बद्रीनाथ) जाते समय मार्ग में सुबाहु नरेश की राजधानी में ठहरे थे जो आज श्रीनगर (गढ़वाल स्थित) नाम से प्रसिद्ध है एवं इस राज्य के निवासी किरात, तंगण तथा पुलिन्द थे

किरात तंगण कीर्ण पुलिन्द रात संकुलम्
हिमवत्य वरं जुष्टं पिकाश्चर्य समाकुलम।।

रामचन्द्र जी के बनवास जाने पर उनके कुलगुरु वशिष्ठ जी इसी किरात भूमिहिमदाव’ (हिंदाव, टिहरी गढ़वाल) में आकर यहाँ पर स्थित एक कन्दरा में अपनी पत्नी अरुन्धति के साथ कुछ काल तक रहे थे। बनवास के पश्चात् जब लक्ष्मण जी उन्हें लेने आए तो कुलगुरु ने इस क्षेत्र की महिमा का विशद् वर्णन करते हुए इसे शिवधाम बताया था।

अतः यह प्रमाणित हो जाता है कि यह क्षेत्र रामायण तथा महाभारत काल में किरात भूमि के रूप में प्रसिद्ध था। इन किरातों के अधिपति या जननायक की उपाधि शिवसिद्ध होती है जिसका विश्वस्त प्रमाण महाभारत के वनपर्व में मिलता है। वनपर्व अध्याय 36 में लिखा है कि इस क्षेत्र के मध्य स्थित श्रीनगर के निकट ही किरातात्मा महादेव शिवजी से पाण्डुपुत्र अर्जुन का तुमुल संग्राम हुआ था। इस घटना का विस्तृत वर्णन केदारखण्ड के (स्कन्दपुराण के अन्तर्गत) अध्याय 181 में भी किया गया है

किरातात्मा महादेव स्वबाणं प्रजाहारः
एव एव बभूवास्य फाल्गुनस्य शरस्तथा।
ततस्त्यक्त्वा तुतं भिल्लं किरातान्समपीडयत्
किराता समनुप्राप्ता असंख्यातास्तपोगीरेः।।
नाना शस्त्र प्रहरणः के चिल्लं गुडहस्तकाः।
सेना कैरातिकी दृष्ट्वा प्रजहासार्जुनस्तदा।। 

इस वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह स्थान किरातों का मुख्य गढ़ था और यहीं पर असंख्य किरातों ने अपने नेता शिव के झन्डे के नीचे अर्जुन से युद्ध किया था। जिस स्थान पर यह युद्ध हुआ वहाँ आजविल्लव केदारनामक प्रसिद्ध तीर्थ-स्थान बन गया है जो कि श्रीनगर से 6 मील के अन्तर पर अलकनन्दा के बाँए तट पर विद्यमान है। यहशिव प्रयागके नाम से भी विख्यात है तथा यहाँ पर प्राचीन शिवलिंग स्थापित है।

आचार्य कवि राजशेखर ने भी अपने ग्रन्थकाव्य मीमांसाके भौगोलिक वर्णन में शिव के निवास स्थान का सुन्दर वर्णन किया है। किरात जाति के शौर्य एवं कान्तिमय व्यक्तित्व की भी इन्होंने भूरि-भूरि प्रशंसा की है

मार्गा पन्थानं प्रियांत्यक्ता दुराकृष्ठशिलीमुखम्।
स्थितं पन्थानं मा नृत्य कि किरात पश्याति।।

अतः सभी प्रामाणिक तथ्य यही सिद्ध करते हैं कि उत्तराखण्ड के आदि निवासीकिरातनाम से प्रसिद्ध थे। अब प्रश्न यह उठता है कि येकिरातथे कौन? यदि सप्तसिन्धु को उत्तराखण्ड माना जाए तो किरात भी आर्य जाति के ही थे। वैदिक काल में ही आर्य लोग अपनी जन्मभूमि अर्थात उत्तराखण्ड से बाहर आकर चारों दिशाओं में फैलने लगे थे। आर्य सभ्यता के प्रसार हेतु इनमें से अधिकांश विद्वज्जन एवं धनुर्धारी वीरकृणवन्तों विश्वमार्यम्का जयघोष करते हुए भारत एवं विश्व के विभिन्न स्थानों में गए। यहाँ के सभी लोगों को बाहर जाना सम्भव था। जो लोग अपनी जन्मभूमि में ही रुक गए वही कालान्तर मेंकिरातकहलाये। इनमें वे प्रवासी भी शामिल हैं। जो वैदिक काल में अपने आदि स्थान को त्यागकर गए थे किन्तु मैदानी भागों में रोगग्रस्त हो गये। इस कारण उन्हें पुनः अपनी जन्मभूमि उत्तराखण्ड को लौटना पड़ा।

जब किरात जाति का पर्वतीय क्षेत्रों में प्रसार हुआ तो कोल जाति को या उसका ग्रामसेवक बनना पड़ा अथवा अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा हेतु दुर्गम बीहड़ पठारों, उच्च पर्वतीय ढालों या भोटांतिक प्रदेश की उन संकीर्ण निर्जन घाटियों में शरण लेनी पड़ी जिनसे आगे बढ़ने का मार्ग भारत-तिब्बत सीमा पर स्थित हिमाच्छादित श्रेणियाँ रोके हुए हैं। कुछ समय पश्चात् पश्चिम की ओर से खश जाति ने हिमालय के उत्तम चराई क्षेत्रों से किरात जाति को उत्तर की दुर्गम घाटियों की ओर धकेल दिया। वहाँ पहले से ही बसी हुई कोल जाति को उनसे अधिक शक्तिवान किरात जाति ने आमूल नष्ट कर दिया। 

किरात जाति पशुचारक आखेटक जाति थी। वह भेड़ें पालती एवं काले कम्बल की गाती से शरीर ढकती थीं। हाथ में धनुष-बाण लिए हुए तथा कमर में कटार खोंस कर वह वनों में आखेट करती थीं। जब लघु हिमालय के पठारों में किरात लोगों का पूर्ण प्रसार हो गया तो कई शताब्दियों पश्चात् पश्चिम में ईरान अफगानिस्तान सेदरदतथाखशनामक पशुचारक जातियों की टोलियों नेदरदिस्तान कश्मीर के रास्ते पूर्व की ओर से लघु हिमालय के पठारों पर आगमन प्रारम्भ कर दिया।खशजाति भी पशुचारक, आखेटक एवं वीर जाति थी। अपने अस्तित्व की रक्षा हेतु इस जाति को बेबीलोनिया, एशिया माइनर, ईरान अफगानिस्तान में अपने शत्रुओं से निरन्तर संघर्ष करना पड़ा।खशजाति की प्रतिद्वन्द्विता मेंकिरातटिक सके। शनैःशनैःखशलोगों ने किरातों के अच्छे चारागाहों को छीनकर कश्मीर, कांगड़ा, हिमांचल, गढ़वाल, कुमाऊँ तथा पश्चिमी नेपाल में स्थित लघु हिमालय की ढालों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया।

उत्तराखण्ड में कुणिन्द राजवंश का इतिहास

 

कुणिन्द राजवंश का इतिहास (History of Kunind Dynasty)

उत्तराखण्ड के विभिन्न भागों से कुणिन्दों (Kunind Dynasty) द्वारा जारी सिक्के मिलते हैं इस दृष्टि से अल्मोड़ा जनपद का विशेष स्थान है, यहाँ से केवल कुणिन्दों के अन्य भांति के सिक्के प्रकाश में आये हैं, वरन् विद्वानों ने कुणिन्दसिक्कों के एक विशेष प्रकार को अल्मोड़ा भांति के सिक्के नाम से भी अभिहित किया है कुणिन्दों का उल्लेख अत्यन्त प्राचीन काल से मिलता है, लगभग 6वीं सदी ईस्वी पूर्व के प्रारंभ में रहने वाले पाणिनी ने भी कुणिन्दों का वर्णन किया है, अन्य साहित्यिक साक्ष्यों-महाभारत ; टॉलेमी , महामयूरी ; वायु-पुराण ; ब्रह्माण्ड पुराण ; तथा वारामिहिर में भी कुणिन्दों का उल्लेख मिलता है उपरोक्त तथ्यों से पता चलता है कि मध्य हिमालय के इस क्षेत्र में प्राचीन काल से ही कुणिन्द विद्यमान थे

उन्होंने कब एक राज्य का रूप धारण किया, इस सन्दर्भ में रैप्सन का मानना है कि, मोर्यों और शुंगों के पतन से उत्पन्न परिस्थितियों में उत्तर-पश्चिम भारत में अनेक स्वतंत्र देशी एवं विदेशी सत्ताओं की स्थापना हुई थी, मौर्यों से पूर्व सिकन्दर के काल में भी यह क्षेत्र- आधुनिक पंजाब, हरियाणा, हिमांचल, दिल्ली, राजस्थान के भाग तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश प्रमुखतः सैन्य जातियों या आयुधजीवी संघ द्वारा शासित थे इन जातीय राज्यों में- कुलूट, औदुम्बर, कुणिन्द, यौधेय, राजन्य, अर्जुनायन तथा प्रकट गणराज्यों का उल्लेख मिलता है उपरोक्त गणराज्यों में से- कुलूट, औदुम्बर तथा कुणिन्द गणराज्यों को कौटिल्य ने राज्य शब्दिन संघ या राजा की उपाधि को स्वीकार करने वाले गणराज्य माना है  

मुद्राशास्त्रीय प्रमाणों से भी हिमालय के इस भू-भाग में कुणिन्दों की उपस्थिति के पुष्ट प्रमाण मिलते हैं कनिंघम के समय तक जो मुद्राएँ मिली थीं, उनके आधार पर कनिंघम ने यह निष्कर्ष निकाला था कि कुणिन्दों का वर्चस्व यमुना और सतलज नदियों के मध्य शिवालिक पहाड़ियों की एक संकीर्ण पट्टी तक सीमित था,लेकिन कुणिन्दों से सम्बन्धित बाद की खोजों ने, केवल कुणिन्दों के इतिहास में नवीन प्रकाश डाला है, वरन् उत्तराखण्ड को उनके प्रमुख केन्द्र के रूप में भी उद्घाटित किया है

प्रतीत होता है कि, पाणिनी के काल से ही कुणिन्द पंजाब, हरियाणा और उत्तराखण्ड के पहाड़ी भूभागों में छोटे-छोटे समूहों के रूप में विद्यमान थे कालान्तर में उन्होंने शक्ति अर्जित की और अमोघभूति के नेतृत्व में लगभग द्वितीय सदी ईस्वी पूर्व के अन्त तक एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना कर ली अमोघभूति एक शासक का नाम था अथवा यह झुणिन्दों की एक पदवीं थी इस विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है जायसवाल ने अमोघभूति को व्यक्ति विशेष मानकर एक राजकीय पदवी माना है और इसका अर्थ- कभी समाप्त होने वाला वैभव बतलाया है लेकिन अधिकांश विद्वान अमोघभूमि को एक शासक का नाम मानते हैं और यह मत प्रतिपादित करते हैं कि इण्डो-ग्रीक शासकों के पतन के पश्चात् अमोघभूति ने शक्ति अर्जित की और अपने सिक्के जारी किये

कार्तिकेयपुर राजवंश (700 ई०) (Kartikeypur Dynasty 700 AD)

§  स्थापना – 700 .

§  उत्तराखंड का प्रथम ऐतिहासिक राजवंश

§  संस्थापक – बसन्तदेव

§  प्रथम राजधानी – जोशीमठ (चमोली)

§  राजधानी स्थानांतरित – बैजनाथ (बागेश्वर) के पास बैधनाथ-कार्तिकेयपुर (कत्यूर घाटी)

§  स्रोत – बागेश्वर, कंडारा, पांडुकेश्वर, एवं बैजनाथ आदि स्थानो से प्राप्त ताम्र लेख।

§  देवता – कार्तिकेय

§  वास्तुकला तथा मूर्तिकला के क्षेत्र में यह उत्तराखंड का स्वर्णकाल था।

§  इस राजवंश को उत्तराखंड मध्य हिमालयी क्षेत्र का प्रथम ऐतिहासिक राजवंश माना जाता है।

§  इतिहासकार लक्ष्मीदत्त जोशी के अनुसार कार्तिकेयपुर के राजा मूलतः अयोध्या के थे।

§  इतिहासकार बद्रीदत्त पांडे के अनुसार कार्तिकेयपुर के राजा सूर्यवंशी थे।

कार्तिकेयपुर राजवंश के परिवार

1. बसंतदेव का राजवंश (कार्तिकेयपुर का प्रथम परिवार) 

मूलअमेरिकी

§  संस्थापक – बसन्तदेव था।

§  स्रोत – बागेश्वर त्रिभूवन राज शिलालेख

§  उपाधि – परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर

§  यह कार्तिकेयपुर राजवंश के प्रथम शासक था।

§  बसन्तदेव ने बागेश्वर समीप एक मंदिर को स्वर्णेश्वर नामक ग्राम दान में दिया था।

§  बागेश्वर, कंडारा, पांडुकेश्वर, एवं बैजनाथ आदि स्थानो से प्राप्त ताम्र लेखों से इस राजवंश के इतिहास के बारे में जानकारी मिलती है। 

2. खपरदेव वंश 

§  खर्पर देव वंश का विवरण बागेश्वर लेख में मिलता है।

§  खपरदेव वंश की स्थापना खर्परदेव ने की जो कि कार्तिकेयपुर में बसंतदेव के बाद तीसरी पीढ़ी का शासक था।

§  इसका पुत्र कल्याण राज था।

§  खर्परदेव वंश का अंतिम शासक त्रिभुवन राज था। 

3. निम्बर वंश (कार्तिकेयपुर का द्वितीय परिवार)

§  संस्थापक – निम्बर देव

§  निम्बर वंश का सर्वाधिक उल्लेख – पांडुकेश्वर (जोशीमठ) के ताम्रपत्र में मिलता हैं।

§  पांडुकेश्वर ताम्रपत्र की भाषा संस्कृत

निम्बर वंश में निम्न शासक हुए 

1. निम्बर यह निम्बर वंश का संस्थापक था। इसे शत्रुहन्ता भी कहा गया है। 

मूलअमेरिकी

2. इष्टगण इसने समस्त उत्तराखंड को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया  कार्तिकेयपुर राज्य की सीमाओं को वर्तमान गढ़वाल कुमाँऊ तक विस्तारित किया।

3. ललितशूर देव

§  यह एक महान निर्माता था।

§  इन सभी राजाओं में सर्वाधिक ताम्रपात्र ललितसुरदेव के प्राप्त हुए।

§  पांडुकेश्वर के ताम्रपत्र में इसे कालिकलंक पंक में मग्न धरती के उद्धार के लिये बराहवतार बताया गया

4. भूदेव

§  ललितसूरदेव का पुत्र भू-देव निम्बर वंश का अंतिम शासक था।

§  इसने बैजनाथ मंदिर के निर्माण में सहयोग किया।

§  बैजनाथ मंदिर बागेश्वर जिले के गरुड़ तहसील में स्थित है।

§  यह मंदिर 1150 ई० में बनाया गया।

4. सलोड़ादित्य वंश (कार्तिकेयपुर का तीसरा परिवार

§  तालेश्वर एवं पांडुकेश्वर के ताम्रपत्र लेखों से ज्ञात होता है कि निम्बर वंश के बाद कार्तिकेयपुर में सलोड़ादित्य वंश के शासन का वर्णन मिलता है।

§  सलोड़ादित्य वंश की स्थापना सलोड़ादित्य के पुत्र इच्छरदेव ने की।

§  इच्छरदेव के बाद इस वंश में देसतदेव, पदमदेव, सुमिक्षराजदेव आदि शासक हुए।

§  सुभिक्षराजदेव के बाद उसके किसी वंशज ने राजधानी कार्तिकेयपुर से कुमाँऊ के गोमती घाटी (कत्यूर घाटी) में स्थानांतरित की, जिसे बैजनाथ शिलालेख में वैधनाथ कार्तिकेयपुर कहा गया है।

शंकराचार्य का उत्तराखण्ड आगमन 

§  शंकराचार्य भारत के महान दार्शनिक धर्मप्रवर्तक थे।

§  शकराचार्य का आगमन उत्तराखंड में कार्तिकेयपुर राजवंश के शासन काल मे हुआ।

§  शंकराचार्य ने हिन्दू धर्म की पुनः स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

§  इन्होंने भारतवर्ष में चार मठों की स्थापना की थी
(1)
ज्योतिर्मठ (बद्रिकाश्रम)
(2)
श्रृंगेरी मठ
(3)
द्वारिका शारदा पीठ
(4)
पुरी गोवर्धन पीठ

§  सन 820 ई० में इन्होंने केदारनाथ में अपने शरीर का त्याग कर दिया था।

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