3-History of Katyuri Rajvansh
कार्तिकेयपुर (कत्यूरी राजवंश राज्य प्रशासन)
पदाधिकारी
§ प्रान्तपाल – सीमाओ की सुरक्षा
§ घट्टपाल – गिरीद्वारों का रक्षक
§ वर्मपाल – सीमावर्ती भागों में आने जाने वाले व्यक्ति पर निगाह रखता था
§ नरपति – नदी घाटों पर आगमन की सुविधा व कर वसूली
सेना व सैन्यधिकारी
|
सेना |
सेना नायक |
|
1. पदातिक सेना |
गोल्मीक |
|
2.अश्वारोही सेना |
अश्वाबलाधिकृत |
|
3. गजारोगी सेना |
हस्तिबलाधिकृत |
|
4. उष्ट्रारोहि सेना |
उष्ट्रबलाधिकृत |
|
तीनों आरोही सेना का सर्वोच्च पदाधिकारी – हस्त्यासवोष्ट्रबलाधिकृत |
|
पुलिस विभाग के अधिकारी
§ दोषापराधिक – अपराधी को पकड़ने वाला
§ दुःसाध्यसाधनिक – गुप्तचर विभाग का अधिकारी
§ चोरोद्वरणिक – चोर डाकुओं को पकड़ने वाला
कृषि से सम्बंधित अधिकारी
§ आय साधन – कृषि व वन
§ क्षेत्रपाल – कृषि की उन्नति का ध्यान रखने वाला
§ प्रभातार – भूमि की नाप
§ उपचारिक – भूमि के अभिलेख रखने वाला
§ खण्डपति – वनों की रक्षा करने वाला
कर अधिकारी
§ भोगपति – कर वसूली करने वाला
§ भट्ट और चार – प्रसार – प्रजा से बेगार लेने वाला
शासन-प्रशासन
§ राज्य – राजा
§ प्रान्त – उपरिक
§ जिले – विषपति
कत्यूरी वंश की स्थापना एवं इतिहास
डा. ताराचन्द्र
त्रिपाठी के
अनुसार
तालेश्वर
तथा
पाण्डुकेश्वर
के
दान
पत्रों
से
कार्तिकेयपुर
राज्य
की
अनेक
प्रशासनिक
इकाइयों
और
उनमें
स्थित
स्थानों
का
उल्लेख
मिलता
है।
तालेश्वर
दान
पत्रों
में
कार्तिकेयपुर
के
अन्तर्गत
वर्णित
सभी
स्थान
कत्यूर
घाटी
में
विद्यमान
हैं।
अतः
यह
निश्चित
है
कि
कार्तिकेयपुर
नरेशों
के
युग
से
बहुत
पहले
कार्तिकेयपुर
कत्यूर
घाटी
में
विद्यमान
था।
पर
जब
पाण्डुकेश्वर
दानपात्रों
में
वर्णित
कार्तिकेयपुर
और
उसके
अन्तर्गत
सांकेतिक
स्थान-नामों
को
पहचानने
का
प्रयास
किया
जाता
है
तो
लगभग
सभी
स्थान-नाम
वर्तमान
जोशीमठ
तहसील
में ही
मिल
जाते
हैं।
पाण्डुकेश्वर
के
प्रथम
दो
दानपात्र
और
कंडारा
से
प्राप्त
एक
दान
पत्र
कार्तिकेयपुर
नरेश
ललितश्वर
देव
का
है,
एक
दानपत्र
पद्मटदेव
का
है,
एक
दानपत्र
देशटदेव
का
और
एक
सुभिक्षराज
देव
का
है।
जोशीमठ
और
कत्यूर
घाटी,
दोनों
ही
पुरावशेषों
की
दृष्टि
से
सम्पन्न
क्षेत्र
हैं।
कदाचित्
पहले
राजधानी
जोशीमठ
और
कालान्तर
में
राज्य
का
विस्तार
हो
जाने
के
कारण
जोशीमठ
को
राजधानी
के
लिए
अनुपयुक्त
पाते
हुए
कत्यूर
घाटी
की
ओर
संक्रमित
हुए
होंगे
और
कत्यूरी
वंश
के
नाम
से
जाने
गए
होंगे।
जनश्रुति के अनुसार कत्यूरी वंश का संस्थापक वासुदेव था किन्तु उसका नाम किसी भी अभिलेख या वंशावलि में नहीं मिलता। काबुल के कटोरमान वंश का अन्तिम नरेश भी वासुदेव था। एटकिन्सन दोनों को एक मानने के पक्ष में है किन्तु बागेश्वर में प्राप्त त्रिभुवनराज के शिलालेख से विदित होता है कि प्रथम कत्यूरी नरेश का नाम बसन्तनदेव था, न कि बासुदेव। कत्यूरी नरेश ‘ललितशूर’ की राज्य अवधि को ध्यान में रखते हुये यही अनुमानित है कि ‘बसन्तनदेव’ का राज्यकाल सन् 633 ई0 से 645 ई0 तक किसी समय भी आरम्भ होता है। कार्तिकेयपुर के नरेशों के अब तक
आठ
अभिलेख
मिले
हैं।
सभी
अभिलेखों
की
लिपि
कुटिला
है
जो
नवीं
व
दसवीं
सदी
के
मगध
के
पालवंशी
नरेशों
के
अभिलेखों
में
तथा
कुछ
तिब्बत
से
प्राप्त
ताम्रपत्रों
में
मिलती
है।
कत्यूरी अभिलेखों से विदित होता है कि एक ही राजवंश के तीन परिवारों ने कार्तिकेयपुर या उसके आसपास अपनी राजधानी स्थापित कर एक-दूसरे के पश्चात् शासन किया था। इन राजपरिवारों के संस्थापक बसन्तनदेव, निम्बर देव और सलोणादित्य थे। अभिलेखों की शब्दावली, अधिकारियों के नाम की सूची तथा अन्य प्रमाणों से यह ज्ञात होता है कि सलोणादित्य के परिवार ने निम्बरदेव के परिवार के पश्चात् राजसिंहासन प्राप्त किया था।
ललितशूर के राज्यकाल के 21वें व 22वें वर्ष के दो ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं। जिनसे यह प्रमाणित होता है कि ललितशूर का राज्यारम्भ सन् 832 तथा मृत्यु सन् 854 ई0 के बाद हुई। यही नहीं उन ताम्रपत्रों से यह भी सिद्ध होता है कि ललितशूर कत्यूरी वंश का सर्वाधिक प्रतापी एवं शौर्यवान नरेश था।
अभिलेखों में कत्यूरी नरेशों की सतयुगी धर्म का अवतार, प्राचीन मर्यादाओं के रक्षक तथा अत्यधिक चरित्रवान बताया गया है। वे आदर्श जीवन बिताते थे एवं विद्यानुरागी थे। उनकी सभा में सुदूर स्थानों से विद्वान ब्राह्मण पधारते थे जिन्हें बहुमूल्य उपहार, स्वर्ण आदि प्रदान कर सम्मानित किया जाता था। इसीलिये राजा को ईश्वर का अंश माना जाता था जिसके दर्शनमात्र से पाप मुक्त हो जाते थे।
कत्यूरियों की राजधानी वर्तमान जोशीमठ में थी। जोशीमठ से आगे भारत-तिब्बत सीमा तक बहुत कम गाँव हैं। यदि यहाँ पर तिब्बत का अधिकार होता तो कत्यूरी नरेशों की राज्य सीमा कम से कम भारत व तिब्बत के मध्यवर्ती गिरिद्वारों वाली श्रेणी तक होती। प्राचीन जनश्रुति के अनुसार जोशीमठ को राजधानी बनाकर शासन करने वाले कत्यूरी नरेशों का राज्य पश्चिम में सतलुज नदी के तट से लेकर दक्षिण के मैदान तक फैला था। वर्तमान सम्पूर्ण रूहेलखण्ड उनके शासन के अन्तर्गत आता था।
चन्द्रगुप्त मौर्य
की
ही
भाँति
कत्यूरी
नरेशों
के
निम्नांकित
विभिन्न
पदाधिकारी
होते
थे
:-
इतिहास
§ प्रान्तपाल – सीमाओं का जागरूक प्रहरी सीमाओं की सुरक्षा का भार लिये होता था।
§ घट्टपाल- विभिन्न गिरिद्वारों के रक्षक होते थे।
§ वर्मपाल- सीमावर्ती मार्गों से आने व जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर कड़ी निगाह रखता था।
§ नरपति- नदी घाटों पर आवागमन की सुविधा, कर की वसूली तथा संदिग्ध व्यक्तियों की गतिविधियों की छानबीन करता था।
§ सेना- कत्यूरी वीरवाहिनी अपने शौर्य व सफलताओं के लिये जग-प्रसिद्ध है। इसी के बल पर कत्यूरी नरेशों ने उत्तर व दक्षिण के आक्रान्ताओं को पराजित कर उत्तराखण्ड पर कई वर्षों तक शासन किया। सेना चार भागों में विभाजित थीपदातिक, अश्वारोही, गजारोही एवं ऊष्ट्रारोही। पदातिक (पैदल सेना) ‘गौल्मिक’ कहलाते थे। अश्वारोही सेना का सर्वोच्च नायक ‘अश्वबलाधिकृत’ गजारोही का ‘हस्तिबलाधिकृत तथा ऊष्ट्रारोही का ‘ऊष्ट्रबलाधिकृत’ कहलाते थे। तीनों आरोही सेनाओं का सर्वोच्च पदाधिकारी ‘हस्त्यासवोष्ट्रबलाधिकृत कहलाता था। सैन्य संचालन नरेश द्वारा होता था।
§ पुलिस व्यवस्था- प्रजा के जीवन एवं सम्पत्ति की सुरक्षा हेतु तथा राज्य में शान्ति एवं सुव्यवस्था बनाये रखने के लिये एक पुलिस विभाग था। इस विभाग के अनेक अधिकारियों के नाम कत्यूरी ताम्रलेखों में सुरक्षित हैं।
आय
के
साधन
§ राज्य की आय के प्रमुख साधन कृषि, खनिज सम्पदा एवं वन थे।
§ ‘क्षेत्रपाल’ राज्य में कृषि की उन्नति का ध्यान रखता था।
§ ‘प्रभातार’ का कार्य भूमि की विधिपूर्वक नाप करता था।
§ ‘उपचारिक’ या ‘पट्टकोषचरिक’ नामक अधिकारी भूमि के अभिलेख रखता था।
§ भूमि की नाप उसमें बोए जाने वाले बीज के अनुसार होती थी।
§ कत्यूरी शासन में द्रोणाबापम के अतिरिक्त नालीबापम या एक नाली (349 पाथा 342 सेर) बीजवाली भूमि का भी उल्लेख है।
§ अब भी उत्तराखण्ड में द्रोण (दूण) और नाली (पाथा) का प्रयोग उसी प्रकार चला आता है।
§ खण्डपति व ‘खण्डरक्षारथानाधिपति’ नामक अधिकारी खनिज तथा वनों की रक्षा तथा सम्बन्धित उद्योगों की व्यवस्था करता था।
§ ऊन तथा ऊनी वस्त्र, पालतू पशु-पक्षी, मधु तथा वन-औषधियों के विक्रय से जनता तथा राज्य को प्रचुर लाभ होता था।
कर व्यवस्था
§ कत्यूरी अभिलेखों में विभिन्न करों के नाम मिलते हैं।
§ ‘भोगपति’ व ‘शौल्किक’ नामक अधिकारियों का उल्लेख मिलता है, जिनका कार्य योग और शुल्क आदि करों को वसूल करना था।
§ कृषि तथा पशुओं से प्राप्त पदार्थों का निश्चित अंश कर के रूप में लिया जाता था।
§ भट और चार-प्रचार नामक अधिकारी प्रजा से बिष्टि या बेगार लेते थे। जो भूमि किसी देव मन्दिर को अग्रहार के रूप में दी जाती थी उस पर बसे लोगों से भट और चाट बिष्टि नहीं ले सकते थे और न उनसे अन्य किसी प्रकार का योग या शुल्क लिया जाता था।
§ वे इन करों को राजा को न देकर मन्दिर को देते थे।
राजस्व संबंधी पैमाने
ताम्रपत्रों में-
द्रोण,
कुल्य,
खारि-
जैसे
भूमि
माप
के
विभिन्न
पदों
का
उल्लेख
आया
है।
इससे
पता
चलता
है
कि
भूमि-माप
की
परंपरा
विद्यमान
थी।
इन
इकाईयों
का
विश्लेषण
अग्रांकित
शीर्षकों
के
अन्तर्गत
किया
जा
सकता
है
–
द्रोणवाप
संस्कृत में ‘वप्’ का अर्थ बीज बोने से है। प्राचीन अभिलेखों में ‘वाप’ प्रत्यय लगाकर बीज की मात्रा प्रकट करने की परंपरा मिलती है। एक द्रोण प्रायः 32 सेर का माना जाता है। अन्य मानकों से तुलना करते हुये एक द्रोण वाप 32 सेर या 16 नाली का बताया गया है। द्रोण आज भी ‘दुन’ के रूप में प्रचलित है। अतः एक द्रोण
वाप
को
हम
उतने
क्षेत्र
से
समीकृत
करेंगे
जितने
में
32 सेर
बीज
छिटक
कर
बोया
जा
सके।
ब्रिटिश
काल
में
एक
नाली
को
मानकीकृत
कर
240 वर्ग
गज
निश्चित
किया
गया
था
जो
आज
भी
में
व्यवहृत
है।
इस
आधार
पर
एक
द्रोण
माप
3840 वर्ग गज
क्षेत्र
का
द्योतक
है।
कुल्यवाप
‘कुल्यवाप’
पद
भी
प्राचीन
अभिलेखों
में
मिलता
है।
गुप्तकाल
में
‘कुल्य’
पद
बहुतायत
से
उल्लिखित
हुआ
है।
वर्तमान
में
इस
पद
का
स्पष्ट
अर्थ
लगाना
कठिन
है,
इसका
अर्थ
‘कुलि’
बतलाया
जाता
है
और
एक
कुलि
आठ
द्रोण
के
बराबर
माना
जाता
है।
इस
आधार
पर
एक
कुलि
वाप
उतना
क्षेत्र
माना
जाना
चाहिए
जिसमें
256 सेर
बीज
छिटक
कर
बोया
जा
सके
।
ब्रिटिश
मानकों
के
आधार
पर
यह
30720 वर्ग
गज
क्षेत्र
का
द्योतक
है
।
खारिवाप
पाणिनी ने खारिवाप को द्रोणवाप से बड़ा बतलाया है। प्रचलित एक खारि 20 द्रोण की मानी जाती है। अतः एक खारिवाप ऐसे भू-क्षेत्र को बतलायेगी जिसमें 20 द्रोण या 640 सेर बीज छिटक कर बोया जा सके। ब्रिटिश मानकों के आधार पर यह क्षेत्र 76800 वर्ग गज क्षेत्र का द्योतक है।
जोशीमठ से कत्युर आने की कहानी
डॉ. शिवप्रसाद डबराल का अनुमान है कि कत्यूरी राजाओं का मूल निवास स्थान जोशीमठ (ज्योतिर्धाम) था। वहाँ से वे कत्यूर आए। उनके कत्यूर आगमन की कहानियाँ इस प्रकार हैं –
राजा वासुदेव के कोई गोत्रधारी मृगया के लिये गए थे। घर में विष्णु भगवान नृसिंह के रूप में आये। रानी ने अपूर्व आदर-सत्कार कर भोजनादि करवाया तत्पश्चात् नृसिंह राजा के पलंग पर विश्राम हेतु आसीन
हुए।
राजा
लौटकर
आये
और
अन्तःपुर
में
अपने
पलंग
पर
किसी
अन्य
व्यक्ति
को
देख
क्रोधोन्मत
हो
गये
और
उन्होंने
तलवार
का
भरपूर
वार
नृसिंह
पर
किया,
किन्तु
आश्चर्य!
रक्त
के
स्थान
पर
उनके
हाथ
से
दूध
निकलने
लगा।
इस
घटना
से
किंकर्तव्यविमूढ़
हो
वे
रानी
के
पास
गये। रानी
ने
बताया
कि
वे
कोई
देवता
हैं।
जिन्होंने
बड़ी
पवित्रता
के
साथ
भोजन
किया
एवं
विश्रामार्थ
पलंग
पर
सो
गये।
तब
राजा
को
अत्यधिक
पश्चाताप
हुआ।
उन्होने
हाथ
जोड़कर
नृसिंह
देवता
को
प्रणाम
किया
और
अपने
दोष
के
लिये
दंड
देने
की
याचना
की।
देवता
ने
कहा-
‘मैं
नृसिंह हूँ।
तेरे
शासन
से
प्रसन्न
था।
इसलिए
तेरे
महल
में
आया।
तेरे
अपराध
का
यही
दंड
है
कि
तू
जोशीमठ
से
कत्यूर
चला
जा,
वहीं
तेरी
राजधानी
होगी।
याद
रख
यह
घाव
तेरे
मन्दिर
की
मूर्ति
में
भी
दिखाई
देगा।
जब
मूर्ति
टूट
जायेगी
तभी
तेरे
वंश
का
भी
नाश
हो
जायेगा।”
ऐसा
कहकर
नृसिंह
अन्र्तध्यान
हो
गए।
दूसरा दृष्टांत उस समय का है जब स्वामी शंकराचार्य कत्यूरी रानी के पास आये उस समय राजा विष्णु प्रयाग में स्नान करने गये। यह घटना भी उपर्युक्त से ही मिलती-जुलती है।
इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि यदि कत्यूरी राजा गढ़वाल से कुमाऊँ में आये तो अवश्यमेव कोई धार्मिक कलह उपस्थित हुआ होगा जिस कारण राजा वासुदेव व उनके कुटुम्बी जोशीमठ से कार्तिकेयपुर आने को बाध्य हुये। डा0 पातीराम की कल्पना है कि जब संवत 756 (799 ई0)
में
कनकपाल
मालवा
में
आया
तो
उन
दिनों
सोनपाल
एवं
कत्यूरी
नरेश
गढ़वाल
में
छोटी-छोटी
ठकुराइयों
के
स्वामी
थे।
सोनपाल
का
दामाद
कनकपाल
गढ़वाल
के
मध्यवर्ती
भाग
का
शासक
बन
बैठा
किन्तु
कनकपाल,
जिसे
गढ़वाल
में
परमार
वंश
की
स्थापना
का
श्रेय
प्राप्त
है,
वह
सन्
688 ई0
में
ही
गद्दी
पर
बैठ
चुका
था
और
इसी
वर्ष
गढ़वाल
के
कुछ
अंश
पर
तत्पश्चात्
गोरखा
आक्रमण
तक
सम्पूर्ण
गढ़वाल
पर
परमारों
की
सत्ता
सुदृढ़
हो
चुकी
थी।
इसी
प्रकार
कुमाऊँ
में
चन्द
वंश
की
जड़ें
धीरे-धीरे
गहरी
और
व्यापक
होती
गयीं।
कत्यूरी शासकों की प्रशासनिक व्यवस्था
(Administrative System of
Katyuri Rulers)
कत्यूरी शासकों की प्रशासनिक व्यवस्था का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि राजा सर्वोच्च शासक, देवतुल्य एवं केन्द्रीय प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी था।
मंत्रिपरिषद तथा समस्त
राजकीय पदाधिकारियों की नियुक्ति राजा द्वारा
होती थी। राजा
मंत्रिपरिषद की सहायता
से शासन व्यवस्था का संचालन
करता था।
कत्यूरी
शासनकाल में प्रान्त
अनेक विषयों में
विभक्त थे। कत्यूरी
अभिलेखों में चार
विषयों – कार्तिकेयपुर, टंकणपुर,
अन्तरागविषय एवं एशाल
विषय का उल्लेख
है। राज्य की सबसे छोटी इकाई
ग्राम थी। ग्राम
में महामनुष्य तथा
मुकद्दम नामक अधिकारी
नियुक्त थे। पाण्डुकेश्वर ताम्रपत्र में
कत्यूरी राज्य के केन्द्रीय तथा प्रान्तीय अधिकारियों की निम्नलिखित सूची दी गयी है –
कत्यूरी शासनकाल के अधिकारी व उनके कार्य
|
अधिकारि |
कार्य |
|
अविनियोग स्थान |
दैविक शासक |
|
राजा |
शासक |
|
राजन्वयक |
राजकुमार |
|
राजामात्य |
राज मंत्री |
|
सामन्त |
मंडलिक राजा |
|
महासामन्त |
सेनापति |
|
महाकृता कतृक |
उच्च निरीक्षक |
|
महादण्डनायक |
प्रधान न्यायाधीश |
|
महाप्रतिहार |
प्रधान रक्षक |
|
प्रमातारा |
सर्वेयर |
|
सरभंग |
तीरंदाज |
|
उदाधिक |
अधीक्षक |
|
कुमारामात्य |
राजकुमारों के मंत्री |
|
दुःसाध्य साधनिक |
कठिन कार्य हल करने |
|
दोषापराधिक |
अपराधों की जॉच करने |
|
चौरोधरणिक |
चोरो को पकड़ने वाले |
|
सौलकिक |
चुंगी वसूल करने वाला |
|
गौलमिक |
सैनिक |
|
पट्टकोपचारिक |
राजकीय वस्त्रों के रक्षक |
|
हस्तश्वष्ष्ट्रपाल |
हाथी,घोड़े,ऊटों के रक्षक |
|
व्यापितृक |
मंत्री या राजदूत |
|
दण्डिक |
आसा बरदार |
|
दंडपाशिक |
नाजिर |
|
विषय-व्यापितृक |
जिला मंत्री |
|
गमागमी |
पत्रवाहक |
|
भोगपति |
प्रान्तीय शासक |
|
अमित्वर मानिक |
शीघ्रगामी दूत |
|
राजस्थानिक |
राजभवन के अफसर |
|
विषयापति |
जिलाधीश |
|
खंडपति |
मोहल्लों के अधिकारी |
|
तारापति |
नावों के अधिकारी |
|
अश्वपति |
रिसाले के अधिकारी |
|
खंडरक्ष स्थानापति |
सीमापाल |
|
वर्मपालक |
सड़क के रक्षक |
|
कोशपाल |
खजान्ची |
|
घट्टपाल |
घाटियों के रक्षक |
|
महामनुष्य |
प्रतिष्ठित पुरूष |
|
वर्णिक |
व्यापारी |
|
अष्टादशप्रकृताधिकष्ठानीय |
अठारह विभागों के निरीक्षक |
|
भट् महोत्तम |
सबसे ज्यादा विद्वान पुरूष |
पौरव-वर्मन राजंवश (Paurav Varman Dynasty)
कुणिन्दों के उपरांत उत्तराखण्ड (Uttarakhand) के
इतिहास
की
जानकारी
के
लिए
हमारे
पास
अधिक
साक्ष्य
नहीं
हैं,
हमें
नहीं
मालूम
कि
समुद्रगुप्त
की
प्रयाग
प्रशस्ति
में
वर्णित
कर्त्तपुर
का
शासक
कौन
था।
गुप्त
और
हर्ष
के
अभिलेखों
में उत्तराखण्ड (Uttarakhand) से
संबंधित
केवल
छिटपुट
उल्लेख
मिलते
हैं।
चौथी सदी ईस्वी के उत्तरार्द्ध से सातवीं सदी ईस्वी तक के उत्तराखण्ड (Uttarakhand) के
इतिहास
पर
कुछ
प्रकाश
पुरातात्विक
उत्खननों
से
पड़ता
है,
इस
संदर्भ
में
रणिहाट
में के.
पी.
नौटियाल एवं
साथियों
द्वारा
किया
गया
उत्खनन
महत्वपूर्ण
है,
लेकिन
इस
काल
की
विस्तृत
जानकारी
हमें अल्मोड़ा
जनपद
के
तालेश्वर नामक
स्थान
से
प्राप्त
दो
ताम्रपत्र
अभिलेखों
से
मिलती
है।
चौथी सदी ईस्वी के उत्तरार्द्ध से सातवीं सदी ईस्वी तक के उत्तराखण्ड (Uttarakhand) के
इतिहास
की
जानकारी
के
एकमात्र
स्रोत द्विजवर्मन
का
वृषताप
शासन
और
विष्णुवर्मन
के
ताम्रशासन
को
है, जैसा
कि
बताया
गया
है
कि
ये
ताम्रपत्र
अल्मोड़ा
जनपद
के
तालेश्वर
नामक
स्थान
से
मिले
हैं
इसीलिए
इन्है तालेश्वर
ताम्रपत्र पुकारा
गया
है।
इन
ताम्रपत्रों
से
हमें
न
केवल
इस
काल
में
शासन
करने
वाले
नये
राजवंश
एवं
शासकों
के
नामों
की
जानकारी
होती
है
वरन्
ये
ताम्रपत्र
इस
काल
से
संबंधित
अनेकानेक
सूचनाएं
भी
हमें
उपलब्ध
कराते
हैं।
पौरव-वर्मन राजंवश (Paurav Varman Dynasty)
उत्तराखण्ड (Uttarakhand) में
प्राप्त
ताम्रपत्र
अभिलेखों
में सर्वाधिक
प्राचीन
ताम्रपत्र
अभिलेख
होने
का
श्रेय
तालेश्वर
ताम्रपत्रों
द्विजवर्मन
का
वृषताप
शासन
और
विष्णुवर्मन
के
ताम्रशासन
को
ही
है, ये
दोनों
ताम्रपत्र
अल्मोड़ा
जनपद
के
तालेश्वर
नामक
स्थान
से
जारी
किये
गये
हैं,
तालेश्वर
से
प्राप्त दोनों
ताम्रपत्रों
में
एक-एक
अण्डाकर
मुद्रा
जुड़ी
है।
मुद्रा
में
एक
पसरा
हुआ
वृषभ,
उसके
नीचे
चार-पंक्तियों
का
मुद्रा–लेख
(जिसमें
राजाओं
के
नाम
तथा
वंशावली
उत्कीर्ण
है),
वृषभ
के
सामने
एक
मछली
या
कछुआ
और
नीचे
संभवतः
एक
गरूढ़
है,
वृषभ
के
पीछे
एक
अन्य
प्रतीक
है,
जिसे
पहचाना
नहीं
जा
सका
है, इन
सभी
प्रतीकों
एवं
मुद्रा–लेख
के
ऊपर
एक
नाग
का
फण
प्रदर्शित
है
मुद्राओं
में
संस्कृत
भाषा
और
गुप्त
ब्राह्मी
लिपि
में
अग्रांकित
लेख
उत्कीर्ण
है,
यथा
–
विष्णुवर्मा प्रपा
(पौ)
त्रस्य
पो
(पौ)
त्रस्य
वृषवर्मण
(:)
श्रग्निवर्म
सुतस्येह
शासन
(°) द्विजवर्णण
(: )
………………… नुग्रहार्थाय
साधु
संरक्षणाय
च
सोमवंशोभवो
राजा
जयत्यमितविक्रम
(:)” …………’
गुप्ते के
अनुसार इन
मुद्राओं
में
उत्कीर्ण
अनेक
प्रतीक
चिह्नों
और
मुद्रा
लेख
को
एक
सीधी
रेखा
द्वारा
पृथक
किया
गया
है।
मुद्राओं
में
प्रयुक्त
लिपि-चिह्नों
की
अनेक
विशेषताऐं
गुप्त
लिपि
से
साम्यता
रखती
हैं,
लेकिन
ताम्रपत्रों
के
लिपि-चिह्न
पर्याप्त
बाद
के
हैं।
मुद्रा–लेख के वर्ण–विन्यास का अध्ययन करते हुए गुप्ते ने इस लिपि की अनेक विशेषताएँ गुप्त-लिपि के समान बतलायी हैं, और इन्हीं विशेषताओं के आधार पर मुद्राओं की तिथि चौथी सदी ईस्वी के उत्तरार्द्ध में निश्चित की सरकार तालेश्वर ताम्रपत्रों की लिपि को छठी सदी ईस्वी की ब्राह्मी लिपि से समीकृत करते हैं।
वंशक्रम (Lineage)
जहाँ
तक
पौरव-वर्मन
शासकों
(Paurav Varman Dynasty) के वंशक्रम का सम्बन्ध है ताम्रपत्रों में जुड़ी मुद्राओं से निम्नलिखित वंशक्रम की जानकारी होती है।
विष्णुवर्मन ⇒
वृषवर्मन
⇒ श्री अग्निवर्मन II
द्विजवर्मन ताम्रपत्रों के पाठ से पता चलता है कि ये क्रमशः द्युतिवर्मन और विष्णुवर्मन द्वारा जारी किये गये हैं । इन ताम्रपत्रों और उनमें जुड़ी मुद्राओं के सम्मिलित पाठ से अग्रांकित वंशक्रम निश्चित किया जा सकता है –
अग्निवर्मन ⇒
द्युतिवर्मन
⇒ विष्णुवर्मन
इन मुद्राओं और ताम्रपत्रों के आधार पर के.पी.
नौटियाल ने
अग्रांकित
वंशक्रम
सुझाया
है
–
विष्णुवर्मन ⇒
वृषवर्मन
⇒ अग्निवर्मन II ⇒
द्विजवर्मन
⇒ विष्णुवर्मन
तालेश्वर ताम्रपत्रों में जुड़ी मुद्राओं (एक द्युतिवर्मन के ताम्रपत्र में और दूसरी उसके पुत्र विष्णुवर्मन के ताम्रपत्र)
में
अंकित
पाठ
के
आधार
पर के.के.
थपलियाल ने
पौरव-वर्मन
शासकों
के
(Paurav Varman Dynasty) अग्रांकित वंशक्रम की जानकारी दी है,
विष्णुवर्मन ⇒
वृषवर्मन
⇒ अग्निवर्मन ⇒
द्विजवर्मन
गुप्ते के
अनुसार ताम्रपत्रों
में
दिया
गया
वंशक्रम,
मुद्राओं
में
अंकित
वंशक्रम
से
थोड़ा
भिन्न
है।
मुद्राओं
में
यह
विष्णुवर्मन
से
प्रारंभ
होता
है।
जबकि
ताम्रपत्रों
में
यह
अग्निवर्मन
से
प्रारंभ
किया
गया
है,
ताम्रपत्रों
में
इनके
प्रदानकर्ता
का
नाम
द्युतिवर्मन
मिलता
है
जबकि
मुद्राओं
में
यह
द्विजवर्मन
की
भाँति
पढ़ा
जाता
है।
अभिलेखों में पौरव-वर्मन शासकों (Paurav Varman Dynasty) के
राज्य
का
नाम ‘पर्वताकर
राज्य’ बतलाया
गया
है,
जो
स्पष्टतः
उत्तराखण्ड
के
पर्वतीय
क्षेत्रों
का
ही
परिचायक
प्रतीत
होता
है।
इस राज्य
की
राजधानी
ताम्रपत्रों
में
ब्रह्मपुर
बतलायी गयी
है
जिसे ‘इन्द्र
की
नगरी’ और ‘नगरों
में
श्रेष्ठ’ के
रूप
में
उल्लिखित
किया
गया
है।
तालेश्वर
ताम्रपत्र
इसी
नगर
से
जारी
किये
गये
हैं।
इस ब्रह्मपुर की अवस्थिति के विषय में विद्वानों में अनेक मत हैं। ब्रह्मपुर का
उल्लेख
वारामिहिर
, मार्कण्डेय
पुराण
एवं
चीनी–यात्री
व्हेनसांग
के
यात्रा-वृतान्त
में
भी
मिलता
है।
कनिंघम,
व्हेनसांग
के
विवरण
को
आधार
मानकर
मो-ती-पु-लो
(मतिपुर)
को
मण्डावर
(बिजनौर) से
समीकृत
करते
हैं। मो-ती-पु-लो
से
ब्रह्मपुर
की
दूरी
व्हेनसांग
ने
उत्तर
दिशा
में
300ली
अथवा
50मील
बतलायी
है, इस
विवरण
के
आधार
पर
कनिंघम
ने
ब्रह्मपुर
को
रामगंगा
तटीय
बैराट
पट्टन
लखनपुर
माना
है
तथा
बताया
है
कि
व्हेनसांग
ने
इसे
भ्रमवश
उत्तर-पूर्व
की
जगह
उत्तर
दिशा
में
लिख
दिया। गुप्ते
ने
भी
कनिंघम
के
इस
मत
का
समर्थन
किया
है। फ्युहरर
ने
ब्रह्मपुर
को
गढ़वाल
स्थित
पाण्डुवाला
से
समीकृत
किया
है।
गूज ने पौरव वंश का सम्बन्ध शूलिक वंश से जोड़ते हुए उनके राज्य ब्रह्मपुर का विस्तार कुमाऊँ से लेकर चम्बा (हिमांचल) तक माना है। और तालेश्वर (जनपद अल्मोड़ा) को ब्रह्मपुर की राजधानी बतलाया है पॉवेल प्राइस ब्रह्मपुर की स्थिति कत्यूर घाटी में ही मानते हैं।
नौटियाल एवं सहयोगियों ने इसे रणिहाट से समीकृत किया है। उपरोक्त मतों में से पॉवेल प्राइस का मत अधिक तार्किक प्रतीत होता है, क्योंकि द्विजवर्मन के वृषताप-शासन की 20वीं पंक्ति में ब्रह्मपुर जनपद के अन्तर्गत कार्तिकेयपुर ग्राम का उल्लेख आता है, इससे ब्रह्मपुर की स्थिति कत्यूर घाटी में ही निश्चित होती है। पौरव-वर्मनों (Paurav Varman)से
पूर्व
भी
कत्यूर
घाटी
क्षेत्र
राजनैतिक
दृष्टि
से
महत्वपूर्ण
रहा
है,
गुप्तों
के
काल
में
इसका
उल्लेख
समुद्रगुप्त
की प्रयाग-प्रशास्ति
में
आता
है
और
इससे
पूर्व
की
कुणिन्द
काल
की
अनेक
मुद्राएँ
भी
इस
क्षेत्र
से
प्राप्त
हुई
हैं।
पौरव-वर्मनों
(Paurav Varman) के
उपरान्त
भी
कत्यूरी
शासकों
ने
इस
क्षेत्र
को
महत्वपूर्ण
समझ
कर
अपनी
राजधानी
यहाँ
स्थापित
की
थी।
इस
क्षेत्र
के
महत्व
और
द्विजवर्मन
के
वृषताप
शासन
के
उल्लेख
के
आधार
पर
ब्रह्मपुर
की
स्थिति
कत्यूर
घाटी
में
ही
मानी
जानी
चाहिए।
अनेक अर्थों में प्रयुक्त मिलता है, उत्तराखण्ड से प्राप्त विभिन्न प्राचीन अभिलेखों में भी इसका प्रयोग अनेक तरह से हुआ है, लेकिन यह स्पष्ट है कि यह पद शासकीय शक्ति का प्रतीक था और इससे विभिन्न शासकों की राजनैतिक स्थिति का पता चलता है।
पौरव-वर्मन शासन की प्रकृति (Nature of
Paurav-Varman Rule)
तालेश्वर अभिलेखों के आधार पर पौरव-वर्मन शासन (Paurav Varman Dynasty) की
प्रकृति
जानने
का
प्रसास
भी
किया
गया
है। के.पी.
नौटियाल तालेश्वर
पत्रों
का
विश्लेषण
करते
हुये
पौरव-वर्मन
शासन (Paurav Varman
Dynasty) का
प्रेरणा
स्रोत
गुप्त
शासन
का
बतलाते
हैं।
नौटियाल
के
विश्लेषण
का
आधार
मुख्यतः
तालेश्वर
पत्रों
में
आये
कुछ
ऐसे
पदाधिकारियों
का
उल्लेख
है
जो
गुप्तकालीन
अभिलेखों
में
भी
मिलते
हैं,
वस्तुतः
गुप्तोत्तर
काल
में
उत्तर
भारत
में
स्थापित
होने
वाले
अनेक
राज्यों
द्वारा
जारी
अभिलेखों
में
इन
पदाधिकारियों
का
उल्लेख
मिल
जाता
है,
इसका
तात्पर्य
यह
नहीं
है
कि
इन
सभी
राज्यों
ने
अपने
शासन
प्रबन्ध
में
गुप्त-शासन
से
प्रेरणा
ली
थी
वरन्
आवश्यकता
और परिस्थिति
के
अनुसार
इन
राज्यों
ने
विभिन्न
पदों
का
सृजन
किया
था।
इस
प्रकार
के
प्रभाव
की
व्याख्या
एम.
पी.जोशी,
‘पीअर
पौलिटी
इण्टरॅक्शन’
के
आधार
पर
करते
हुए
बताते
हैं
कि-
प्रत्येक
प्रभुत्व
सम्पन्न
राजनैतिक
संगठन
अपने
स्वतंत्र
अस्तित्व
को
बनाये
रखने
के
लिए
समानान्तर
राजनीतिक
क्रिया-कलाप
करते
रहते
हैं
और
संगठन/संस्था
बनाते
रहते
हैं।भारतीय
इतिहास
के
विभिन्न
चरणों
में
विभिन्न
राज्यों
द्वारा
बनाये
गये
संगठन
इसी
आधार
पर
मिलते
हैं।
अतः
उत्तराखण्ड
के
इतिहास
के
विभिन्न
चरणों
में
विभिन्न
राज्यों
द्वारा
इसी
प्रकार
के
समानान्तर
संगठन
बनाने
की
कल्पना
की
जा
सकती
है
और
माना
जा
सकता
है।
कि
चाहे
पौरव-वर्मन (Paurav Varman)राज्य
हो
अथवा
कत्यूरी
राज्य,
सांस्कृतिक
परिवर्तन
इस
प्रकार
‘पीअर-पौलिटी
संवाद
के
जरिये
भी
हो
सकता
है।
प्रमुख नगर (Major City)
तालेश्वर अभिलेखों में पुर, पुरी- प्रत्यययुक्त स्थलों का उल्लेख मिलता है। संभवतः ये स्थल पौरव-वर्मन (Paurav Varman) काल
के
प्रमुख
नगर
रहे
होगें।
‘पुर’
पद
एक
प्राचीन
संस्कृत
शब्द
है
जो
नगर
का
बोध
कराता
है।
वेदों
में
नगर
शब्द
का
उल्लेख
नही
है
लेकिन
यहाँ
निःसन्देह
पुरों
का
उल्लेख
मिलता
है
जो
कभी-कभी
बड़े
आकार
के
होते
थे
तथा
कभी-कभी
पत्थर
के
बने
(अश्ममयी)
और
लोहे
(आयसी)
होते
थे।
सौ
दिवारों
से
सुसज्जित
(शतभुजी)
पुर
भी
होते
थे।
आर्यों
के
विस्तार
के
समय
शत्रुओं
के
पुरों
को
नष्ट
करने
के
कारण
ही
वेदों
में
इन्द्र
को
पुरन्दर
कहा
गया
है।
तैत्तरीय
आरण्यक
में
‘पुर’
शब्द
केवल
दस्युओं
के
सन्दर्भ
में
किया
गया
मिलता
है।
प्राचीन
भारत
में
पुर
शब्द
उस
क्षेत्र
के
लिए
प्रयुक्त
किया
गया
मिलता
है,
जो
वृहत
खाई
से
घिरा
कम
से
कम
एक
कोस
के
घेरे
में
फैला
और
बड़े-बड़े
भवनों
से
युक्त
हो।
पुर
और
पुरी
को
समानार्थी
माना
जाता
है।
तालेश्वर
ताम्रपत्रों
में
आये
प्रमुख
‘पुर’,
‘पुरी’
प्रत्यययुक्त
स्थानों
का
वर्णन
अधोलिखित
है
–
ब्रह्मपुर (Brahmapur)
तालेश्वर ताम्रपत्र ब्रह्मपुर से ही निर्गत किये हैं। इसकी स्थिति के सम्बन्ध में इस अध्याय के प्रारम्भ में विस्तार से स्पष्ट किया गया है।
कार्तिकेयपुर (Kartikipur)
तालेश्वर पत्रों में कार्तिकेयपुर की सूचना मिलना महत्वपूर्ण है, क्योंकि अनुश्रुतियों के अनुसार कार्तिकेयपुर की स्थापना एक पुराने शहर ‘करवीरपुर’ के
अवशेषों
के
ऊपर
की
गई
थी।
यह
कार्तिकेयपुर
आगे
चलकर कत्यूरी शासकों की
राजधानी
के
रूप
में
प्रसिद्ध
हुआ
था।
प्रतीत
होता
है
कि
पौरव-वर्मनों (Paurav Varman) के
काल
में
ही
कार्तिकेयपुर
की
स्थापना
और
विकास
प्रारंभ
हुआ
तथा
कत्यूरियों
के
आगमन
के समय
यह
इतना
विकसित
हो
गया
था
कि
इसने
कत्यूरियों
का
ध्यान
आकृष्ट
किया
और
राजधानी
के
रूप
में
प्रतिष्ठित
हुआ।
त्रयम्बपुर (Tryambpur)
तालेश्वर द्विजवर्मन के वृषताप शासन पत्र में त्रयम्बपुर का उल्लेख इस प्रकार आता है- “व्र
(ब्र)ह्मपुरे
कार्तिकेयपुरग्रामकस्समज्जाव्यस्ता
च
भूस्त्रयम्बपुरे
…..”।
इससे
प्रतीत
होता
है
कि
त्रयम्बपुर
की
स्थिति
कार्तिकेयपुर
ग्राम
के
समीप
ही
थी।
कार्तिकेयपुर
ग्राम
कत्यूर
घाटी
स्थित
वर्तमान
बैजनाथ
ग्राम
या
इसके
समीपवर्ती
कोई
और
ग्राम
रहा
होगा
जो
आगे
चलकर
विशाल
राजधानी
नगर
के
रूप
में
विकसित
हुआ
था।
इस
आधार
पर
प्रतीत
होता
है
कि
त्रयम्बपुर
भी
बैजनाथ
घाटी
का
कोई
ग्राम
रहा
होगा।
दीपपुरी (Dipapuri)
इस नगरी का उल्लेख भी द्विजवर्मन के वृषताप शासन पत्र की 21 वीं पंक्ति में आया है यथा- “वि
(बि)
ल्वकेजयभटपल्लिका
बचाकरण
ग्रामों
दीपपुर्या
….” अभिलेख
में
इसे
बचाकरण
ग्राम
और
क्रोडशूर्त्य
ग्राम
के
मध्य
स्थित
बतलाया
गया
है,
इससे
अनुमान
लगाया
जा
सकता
है
कि
यह
संभवतः
बागेश्वर
तहसील
में
स्थित
कोई
नगर
रहा
होगा।
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