History of Uttrakhand Part I

 

उत्तराखंड का ऐतिहासिक काल
(Historical period of Uttarakhand) 

उत्तराखण्ड में ऐसे अनेक पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त होते हैं, जिनके आधार पर यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यह क्षेत्र प्रागैतिहासिक काल से ही मानवीय गतिविधियों से सम्बद्ध रहा है। उत्तराखण्ड के इतिहास को दो चरणों प्राग ऐतिहासिक काल एवं ऐतिहासिक काल में विभाजित किया गया है। पुरातत्व की दृष्टि से मानव इतिहास का प्राचीनतम चरण पाषाण युग है।

इतिहासकार डा. मदन मोहन जोशी के अनुसार इसे तीन चरणोंनिम्न पुरा पाषाण युग (Low Paleolithic Age), मध्य पुरापाषाण युग (Middle Paleolithic Age) और उच्च पुरापाषाण युग (Upper Paleolithic Edge) में विभाजित किया गया है। 

निम्न पुरा पाषाण युग के उपकरणों की उत्तराखण्ड में कालसी के निकट यमुना नदी के कगार पर, श्रीनगर के समीप अलकनन्दा के कगार पर, एवं पश्चिमी राम गंगा घाटी, जनपद अल्मोड़ा तथा खुटानी नाला, जनपद नैनीताल में खोज डा. के. पी. नौटियाल एवं डा. यशोधर मठपाल ने की है। गढ़वाल में ही श्रीनगर के समीप डा. के. पी. नौटियाल ने मध्य पुरापाषाण युग के उपकरण मिलने का दावा किया है। हालांकि उच्च पुरापाषाण युग के उपकरण मिलने की सूचना किसी पुराविद ने अभी तक सबूतों के साथ उत्तराखण्ड में नहीं दी है, यद्यपि हिमालय में अन्यत्र इनकी मिलने की सूचना है।

डा. मदन मोहन जोशी का मत है कि उत्तराखण्ड में प्राचीन मानव की गतिविधियों के प्रमाण यहाँ स्थित शैलाश्रयों में अंकित पाषाण युगीन चित्रण से भी प्राप्त होते हैं। ये शिलाश्रय उत्तराखण्ड के दो जनपदों- अल्मोड़ा तथा चमोली में प्राप्त हुए हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार डा. यशवन्त सिंह कटोच के अनुसार सन् 1968 में अल्मोड़ा जनपद के सुयाल नदी के दायें तट पर स्थित लखु उड्यार के शैलाश्रय (Painted Rock Shelters) उत्तराखण्ड में प्रागैतिहासिक शैलाश्रय चित्रों की पहली खोज थी। डा. एम. पी. जोशी की इस महत्वपूर्ण खोज के उपरान्त अल्मोड़ा जनपद में ही फड़कानौली, फलसीमा, ल्वेथाप, पेटशाल, कालामाटी एवं मल्ला पैनाली में भी शिलाश्रय मिले हैं। ये सभी शिलाश्रय, कालामाटी-डीनापानी पर्वत श्रृंखला की पूर्व दिशा में लगभग 15 किमी0 की परिधि में केन्द्रित हैं। गढ़वाल हिमालय में भी दो शैलाश्रयों की खोज हुई है। चमोली जनपद में प्रथम ग्वरख्या-उड्यार, अलकनन्दा घाटी में और द्वितीय पिण्डर घाटी के किमनी ग्राम में। अब तक अल्मोड़ा जनपद में एक दर्जन से अधिक शिलाश्रय प्रकाश में चुके हैं।

लखु उड्यार (Lakhu Cave)

सुयाल नदी के पूर्वी तट पर, लखु उड्यार उत्तराखण्ड का सर्वोत्तम सुलभतम शिलाश्रय है। यह अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ मोटर मार्ग में अल्मोड़ा से लगभग 16 किमी की दूरी पर स्थित है, नागफनी के आकार का यह भव्य शिलाश्रय मोटर मार्ग से ही दिखाई देता है। धूप और वर्षा के कारण फर्श के समीपवर्ती चित्र काफी धुंधले हो चुके हैं। चित्र सफेद, गेरू, गुलाबी और काले रंगों से बने हैं। मुख्य विषय सामूहिक नृत्य का है; एक नर्तक मंडली में कुछ वर्षों पूर्व 34 आदमी गिने जा सकते थे जबकि दूसरे में 28 उत्तर की ओर 6 मनुष्यों को एक जानवर का पीछा करते दिखाया गया है। इसके अतिरिक्त दैनिक जीवन के दृश्य, जानवर और अलंकारिक आलेखन के यहाँ रेखाओं एवं बिन्दुओं से बने ज्यामितीय चित्रण भी मिले हैं। 

लखु उडियार से लगभग आधा कि.मी. पहले फड़का नौली चुंगी घर के आस पास तीन शिलाश्रय है। जिनमें चित्रअवशेष विद्यमान हैं। प्रथम शिलाश्रय की छत नागराज के फन की भांति बाहर निकली है और इसकी दीवार पर आकृतियों के 20 संयोजन विद्यमान है जो सारे के सारे धुंधले हो चुके हैं। दूसरे शिलाश्रय में 10 स्थानों पर चित्रण के प्रमाण हैं। तीसरा शिलाश्रय सड़क के नीचे और सुयाल के तट पर स्थित है। यह आवास के लिए उत्तम स्थान रहा होगा। फड़का नौली के शिलाश्रय 1985 में तथा पेटशाल के 1989 में डा. यशोधर मठपाल ने खोजे थे। लखुउडियार से दो कि.मी. दक्षिण-पश्चिम में पेटशाल गाँव के ऊपर दो चित्रमय शिलाश्रय हैं। जिनको स्थानीय पत्थर निकालने वालों ने क्षतिग्रस्त कर दिया है। इनमें पश्चिम दिशा वाला शिलाश्रय 8 मीटर गहरा तथा 6 मीटर ऊँचा है। इसकी छत 4 मीटर तक बाहर निकली है। पेटशाल की दूसरी गुफा जो 50 मीटर पूर्व में है, इसकी गहराई 3.10 मीटर तथा ऊँचाई 4 मीटर और छत की लम्बाई 2 मीटर है।

अल्मोड़ा से लगभग 8 कि0मी0 उत्तर-पूर्व और फलसीमा गाँव से 2 कि0मी0 दक्षिण-पूर्व में दो चट्टानें विद्यमान हैं। पहली चट्टान पर चित्रण योग्य फलक नहीं हैं। जबकि दूसरी चट्टान में चित्र आंके गए हैं। चट्टान का निचला भाग क्षतिग्रस्त है। समीप ही दो चट्टानों पर 2 कप मार्क है।। अल्मोड़ा नगर से ही 8 कि0मी0 उत्तर में कसार देवी पहाड़ी पर भी कई शिलाश्रय हैं।

अल्मोड़ा बिनसर मोटर मार्ग में दीना पानी से 3 कि0मी0 दूरी में ल्वेथाप नामक स्थान है जहाँ 3 शिलाश्रयों में प्राचीन चित्र हैं। यहाँ लाल रंग के निर्मित चित्र हैं, जिसके कारण यह नाम पड़ा होगा। यहाँ से दूर पूर्वी क्षितिज में लखुउडियार का दृश्य अत्यधिक मनोरम है जिसके आधार पर डा0 यशोधर मठपाल का मानना है कि कल्पना की जा सकती है कि लखुउडियार और ल्वेथाप के निवासी कभी आपस में सम्पर्क बनाए होंगे।

ग्वारख्या उड्यार (Gvaarakhya Cave)

गढ़वाल स्थित ग्वारख्या उड्यार चमोली जिले के डुंग्री नामक गाँव में स्थित है। डा. मठपाल के अनुसार गोरखा काल में नैपाली सैनिकों के एक दल ने गाँवों को लूट कर माल छिपाया था तथा अन्य दलों के परिचय हेतु चट्टानों पर चित्रों के रूप में लिखावट की थी। इस लोक विश्वास पर चित्रित शिलापट का नाम ग्वारख्या उड्यार पड़ा। परन्तु यहाँ तो उड्यार (गुफा) जैसी कोई चीज है ही खजाने छिपाने का स्थान। यहाँ पीले रंग की धारीदार चट्टान पर गुलाबी लाल रंग से चित्र अंकित किए गए हैं जो संप्रति काफी धुंधले हो चुके हैं। डा. यशोधर मठपाल के अनुसार इन शिलाश्रयों में लगभग 41 आकृतियाँ हैं जिनमें 30 मानवों की, 8 पशुओं की तथा 3 पुरुषों की हैं। चित्रकला की दृष्टि से ये उत्तराखण्ड की सम्भवतः सबसे सुन्दर कृतियाँ हैं। यहाँ मनुष्य को त्रिशूल आकार से अंकित किया गया है। जब कि बकरीनुमा जानवरों के छाया चित्र काफी प्राकृतिक हैं। मुख्य विषय पशुओं को हाँका देकर घेरना है। ग्वारख्या उड्यार को यद्यपि स्थानीय लोग अरसे से जानते थे परन्तु पुराविदों हेतु इसको राकेश भट्ट ने उजागर किया। 

चमोली जनपद में ही कर्णप्रयाग-ग्वालदम मोटर मार्ग पर एक छोटा सा गाँव है किमनी जिसके पास ही श्वेत रंग से चित्रित एक शिलाश्रय है। यहाँ पशुओं आदि की आकृतियाँ अत्यन्त धूमिल अवस्था में विद्यमान हैं। इसके अतिरिक्त उत्तरकाशी के पुरौला कस्बे से 5 कि.मी. दक्षिण में यमुना घाटी में, बांयी ओर सड़क से लगभग 20 मीटर की गहराई पर काले रंग का एक आलेख है जो लगभग मिट चुका है। डा. मठपाल का मानना है कि यह लगभग 2100 से 1400 वर्ष पुराना है तथा शंख लिपि जो अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है, में लिखा है।

उत्तराखंड के कुछ प्रमुख गुफाएँ 

§  वशिष्ठ गुफाटिहरी गढ़वाल

§  हनुमान गुफालंगासू, गिरसा चमोली

§  राम गुफाबद्रीनाथ के समीप 

§  भरत गुफा – लंगासू, गिरसा चमोली

§  व्यास गुफा – बद्रीनाथ के समीप 

§  गौरखनाथ गुफाश्रीनगर 

§  गणेश गुफा – बद्रीनाथ के समीप 

§  शंकर गुफादेवप्रयाग

§  स्कन्द गुफा – बद्रीनाथ के समीप 

§  पांडुखोली गुफादूनागिरी (अल्मोड़ा)

§  भीम गुफाकेदारनाथ के समीप

§  सुमेरु गुफागंगोलीहाट (पिथौरागढ़)

§  ब्रह्मा गुफा – केदारनाथ के समीप

§  स्वधर्म गुफापिथौरागढ़

§  गलछिया गुफा – मालपा (पिथौरागढ़)

प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Times)

प्रागैतिहासिक काल वह काल है जिसकी जानकारी पुरातात्विक स्त्रोतों, पुरातात्विक स्थलों जैसे पाषाण युगीन उपकरण गुफा शैल चित्र आदि से प्राप्त होती है। इस समय के इतिहास की जानकारी लिखित रूप में प्राप्त नहीं हुई है। प्रागैतिहासिक काल को प्रस्तर युग’ भी कहते हैं।

उत्तराखंड में प्रागेतिहासिक काल के साक्ष्य

पाषाणयुगीन उपकरण 

पाषाणयुगीन उपकरण वे उपकरण थे जिनका उपयोग मानव ने अपने विकास के विभिन्न चरणों में किया जैसे हस्त कुठार (Hand Axe), क्षुर (Choppers), खुरचनी (Scrapers), छेनी, आदि।
उत्तराखंड में पाषाणयुगीन उपकरण अलकनन्दा नदी घाटी (डांग, स्वीत), कालसी नदी घाटी, रामगंगा घाटी आदि क्षेत्रों से प्राप्त हुए जिनसे इस बात की पुष्टि होती है कि पाषाणयुगीन मानव उत्तराखंड में भी निवास करते थे।

लेख गुहा चित्र

उत्तराखंड के प्रमुख जिलों अल्मोड़ा, चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ आदि में लेख गुहा चित्र मिले है। 

अल्मोड़ा (Almora) 

अल्मोड़ा जनपद के निम्नलिखित स्थानों से हमें प्रागैतिहासिक काल के बारे में जानकारी मिलती हैं 

लाखू उडुयार (लाखू गुफा)

§  स्थान – अल्मोड़ा (सुयाल नदी के तट पर बसे दलबैंड, बाड़ेछीना गाँव में।)

§  खोज – 1968 ई०

§  खोजकर्ता श्री यशवंत सिंह कठौर और एम.पी. जोशी 

§  उत्तराखंड में प्रागैतिहासिक शैलाश्रय चित्रों की पहली खोज थी।

§  लखुउडियार का हिन्दी में अर्थ हैं लाखों गुफायें अर्थात इस जगह के पास कई अन्य गुफायें भी हैं।

§  विशेषताएं

§  मानव आकृतियों का अकेला समूह में नृत्य करते हुए।

§  विभिन्न पशु पक्षियों का चित्रण किया गया है।

§  चित्रों को रंगों से सजाया गया है।

§  इन शैलचित्रों में भीमबेटका-शैलचित्र के समान समरूपता देखी गयी है।

ल्वेथाप गाँव 

§  स्थान – अल्मोड़ा जिले में

§  विशेषताएं

§  शैल-चित्रों में मानव को हाथो में हाथ डालकर नृत्य करते तथा शिकार करते दर्शाया गया हैं।

§  यहाँ से लाल रंग से निर्मित चित्र प्राप्त हुए है।

पेटशाला

§  स्थान – अल्मोड़ा जिले में (पेटशाला पुनाकोट गाँव के बीच स्थित कफ्फरकोट में)

§  खोज – 1989 ई०

§  खोजकर्ता श्री यशोधर मठपाल  

§  विशेषताएं

§  शैल-चित्रों में नृत्य करते हुए मानवों की आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं।

§  मानव आकृतियां रंग से रंगे है।

फलसीमा

§  स्थान – अल्मोड़ा के फलसीमा में

§  विशेषताएं

§  मानव आकृतियों में योग नृत्य करते हुए दिखाया गया हैं।

कसार देवी मंदिर 

§  स्थान – अल्मोड़ा से 8 किलोमीटर दूर कश्यप पहाड़ी की चोटी पर

§  विशेषताएं

§  इस मंदिर से 14 मृतकों का सुंदर चित्रण प्राप्त हुआ है।

चमोली (Chamoli)

चमोली जनपद के निम्नलिखित स्थानों से हमें प्रागैतिहासिक काल के बारे में जानकारी मिलती हैं  

इतिहास

गवारख्या गुफा

§  स्थान – चमोली जनपद में (अलकनंदा नदी के किनारे डुग्री गाँव के पास स्थित।)

§  खोजकर्ता श्री राकेश भट्ट, इसका अध्ययन डॉ. यशोधर मठपाल ने किया। 

§  विशेषताएं

§  इस उड्यार में मानव, भेड़, बारहसिंगा आदि के रंगीन चित्र मिले हैं।

§  यहाँ प्राप्त शैल-चित्र लाखु गुफा के चित्रों (मानव, भेड़, बारहसिंगा, लोमड़ी) से अधिक चटकदार है।

§  डॉ. यशोधर मठपाल के अनुसार इन शिलाश्रयों में लगभग 41 आकृतियाँ है, जिनमें  30 मानवों की, 8 पशुओं की तथा 3 पुरुषों की है।

§  चित्रकला की दृष्टि से उत्तराखंड की सबसे सुंदर आकृतियां मानी जाती है।

§  चित्रों की मुख्य विशेषता मनुष्यों द्वारा पशुओं को हाँकते हुए और घेरते हुए दर्शाया गया है।

किमनी गाँव 

§  स्थान – चमोली जनपद के थराली विकासखंड में

§  विशेषताएं

§  हथियार पशुओं के शैल चित्र प्राप्त हुए हैं

§  हल्के सफेद रंग का प्रयोग किया गया है।

मलारी गाँव

§  स्थान तिब्बत से सटा मलारी गांव चमोली में। 

§  खोजकर्ता – 2002 में गढ़वाल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा अध्ययन।

§  विशेषताएं

§  हजारों वर्ष पुराने नर कंकाल मिट्टी के बर्तन जानवरों के अंग प्राप्त हुए।

§  2 किलोग्राम का एक सोने का मुखावरण (Gold Mask) प्राप्त हुआ।

§  नर कंकाल और मिट्टी के बर्तन लगभग 2000 ई०पू० से लेकर 6 वीं शताब्दी ई०पू० तक के हो सकते है।

§  डॉ. शिव प्रसाद डबराल द्वारा गढ़वाल हिमालय के इस क्षेत्र में शवाधान खोजे गए है।

§  यहाँ से प्राप्त बर्तन पाकिस्तान की स्वात घाटी के शिल्प के समान है।

मलारी गांव में गढ़वाल विश्विद्यालय के खोजकर्ताओं ने दो बार सर्वेक्षण किया – 

§  गढ़वाल विश्विद्यालय के खोजकर्ताओं को मानव अस्थियों के साथ लोहित, काले एवं धूसर रंग के चित्रित मृदभांड प्राप्त हुए।

§  प्रथम सर्वेक्षण 1983 में आखेट के लिए प्रयुक्त लोह उपकरणों के साथ एक पशु का संपूर्ण कंकाल मिला जिसकी पहचान हिमालय जुबू से की गई साथ ही कुत्ते भेड़ बकरी की अस्थियां प्राप्त हुई।

§  द्वितीय सर्वेक्षण (2001-02) में नर कंकाल के साथ 5.2 किलो का स्वर्ण मुखौटा (मुखावरण), कांस्य कटोरा मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए।

उत्तरकाशी (Uttarkashi)

हुडली

§  स्थान – उत्तरकाशी में

§  विशेषताएं

§  यहां नीले रंग के शैल चित्र प्राप्त हुए।

पिथौरागढ़ (Pithoragarh)

बनकोट

§  स्थान – पिथौरागढ़ के बनकोट क्षेत्र से

§  विशेषताएं

§  8 ताम्र मानव आकृतियां मिली हैं।

चंपावत (Champawat) 

देवीधुरा की समाधियाँ 

§  स्थान – चंपावत जिले में

§  खोज – 1856 में हेनवुड द्वारा

§  विशेषता

§  बुर्जहोम कश्मीर के समान समाधियाँ।

 

उत्तराखंड का इतिहासआद्यैतिहासिक काल (History of Uttarakhand – Prehistoric Period)

प्रागेतिहासिक काल ऐतिहासिक काल के मध्य का समय आद्य ऐतिहासिक काल माना जाता है। यह मनुष्य के सांस्कृतिक विकास का दौर था इस काल के कुछ भाग में लिखित सामग्री प्राप्त नहीं हुई जबकि इसके अग्रिम चरण में लिखित प्रमाण मिले हैं इसलिए आद्य ऐतिहासिक काल का अध्ययन दो स्रोतों के माध्यम से किया जाता है। 

1.      पुरातात्विक स्रोत

2.     लिखित स्रोत या साहित्यिक स्त्रोत

पुरातात्विक स्रोत (Archaeological Sources)

पुरातात्विक साधन अत्यन्त प्रमाणिक होते हैं तथा इनके माध्यम से इतिहास के अन्ध-युगों की भी जानकारी प्राप्त हो जाती है। इसके तहत मूलतः अभिलेख, स्मारक एवं मुद्रा सम्बन्धी अवशेष आते है। उत्तराखण्ड के इतिहास निर्माण में तो इनकी महत्ता और भी अधिक है।

पुरातात्विक स्रोतों को अध्ययन की दृष्टि से निम्न भागों में बांटा गया है

ऊखल-सदृश गड्डे (Cup-Marks)

§  विशाल शिलाओं एवं चट्टान पर बने उखल के आकार के गोल गड्ढों को कप मार्क्स (Cup-marks) कहते हैं।

§  हेनवुड ने सर्वप्रथम चंपावत जिले के देवीधुरा नामक स्थान पर इस प्रकार के (ओखलियों) की खोज की।

§  सर्वप्रथम उत्तराखंड में पुरातात्विक स्रोतों की खोज का श्रेय हेनवुड (1856) को जाता है।

§  रिवेट-कारनक (1877 ई०को अल्मोड़ा के द्वारहाट के कप मार्क्स चंद्रेश्वर मंदिर में लगभग 200 कप मार्क्स मिले जो कि 12 समांतर पंक्तियों में लगे हुए थे।

§  रिवेट-कारनक ने इन शैल चित्रों की तुलना यूरोप के शैलचित्रों से की।

§  डॉ० यशोधर मठपाल को द्वारहाट मंदिर से कुछ दूर पश्चिमी रामगंगा घाटी के नोला ग्राम में इन्हीं के समान 72 कप मार्क्स प्राप्त हुए।

ताम्र उपकरण

§  ये उपकरण तांबे के बने होते थे।

§  ताम्र निखात संस्कृति ऊपरी गंगा घाटी की प्राचीनतम संस्कृति है।

§  हरिद्वार के निकट बहादराबाद से ताम्र निर्मित भाला, रिंस, चूड़ियां आदि नहर की खुदाई के दौरान प्राप्त हुए। एच. डी. सांकलिया के अनुसार ये उपकरण गोदावरी घाटी से प्राप्त उपकरणों के समरूप थे।

§  वर्ष 1986 ई० में अल्मोड़ा जनपद से एक एवं वर्ष 1989ई० में बनकोट (पिथौरागढ़) से आठ ताम्र मानव आकृतियां प्राप्त हुए।

§  इन ताम्र उपकरणों से इस बात की पुष्टि होती है कि गढ़वालकुमाँऊ में ताम्र उत्पादन इस युग में होता था।

महापाषाणीय शवाधान

§  महापाषाणीय शवाधान का सबसे महत्वपूर्ण स्थल मलारी गांव (चमोलीहै यहां 1956 ई० में महापाषाणीय शवाधान खोजे गये जिनकी खोज का श्रेय श्री शिव प्रसाद डबराल को जाता है। मलारी गांव मारछा जनजाति का गाँव है।

§  मलारी में मानव कंकाल के साथ-साथ भेड़, घोड़ो, आदि के कंकाल मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए।

§  राहुल सांकर्त्यन ने हिमाचल प्रदेश के किन्नोर के लिपा गाँव में महापाषाणीय शवाधान की खोज की।

शवाधान शवों को रखने की प्रथा शवाधान कहलाती है। हड़पा सभ्यता में तीन प्रकार की शवाधान विधियाँ थी।

§  पूर्ण समाधिकारण

§  आंशिक समाधिकारण

§  दाह संस्कार

लिखित स्रोत (Written Sources)

वेद 

हिंदूधर्म

§  वेद चार हैऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद।

§  सबसे पुराना वेद ऋग्वेद  नवीनतम वेद अथर्ववेद है।

§  उत्तराखंड का प्रथम उल्लेख हमें ऋग्वेद से प्राप्त होता है।

§  उत्तराखंड को ऋग्वेद में देवभूमि  मनीषियों की पूर्ण भूमि कहा गया है।

ब्राह्मण ग्रन्थ

§  ब्राह्मण ग्रन्थ यज्ञों तथा कर्मकांडों के विधान और इनकी क्रियाओं को समझने के लिए आवश्यक होते हैं। इनकी भाषा वैदिक संस्कृति है।

§  ये पद्य में लिखे गये है।

§  प्रत्येक वेद के ब्राह्मण ग्रन्थ होते हैं।

§  ऐतरेय ब्राह्मण ऋग्वेद का ब्राह्मण ग्रन्थ है।

§  ऐतरेय ब्राह्मण ग्रन्थ उत्तराखंड के लिएकुरुओं की भूमि’ या ‘उत्तर कुरु’ शब्द का प्रयोग हुआ है।

§  कौषीतकि ब्राह्मण ग्रन्थ – वाक् देवी का निवास स्थान बद्री आश्रम में है।

पुराण

§  पुराण 18 हैं जिनमे सबसे बड़ा पुराण स्कंद पुराण है  सबसे पुराना पुराण मत्स्य पुराण है।

§  जातकों में भी हिमालय के गंगातट का वर्णन मिलता है।

स्कंद पुराण

§  स्कंद पुराण में 5 हिमालयी खंडो (नेपाल, मानसखंड, केदारखंड, जालंधर, कश्मीर) का उल्लेख है।

§  गढ़वाल क्षेत्र को स्कंद पुराण में केदारखंड  कुमाँऊ क्षेत्र को मानसखंड कहा गया।

§  केदारखण्ड में गोपेश्वर ‘गोस्थल’ नाम से वर्णित है।

§  स्कंद पुराण में हरिद्वार को ‘मायापुरी’  कुमाँऊ के लिये कुर्मांचल शब्द का उल्लेख मिलता है।

§  कांतेश्वर पर्वत (कानदेवपर भगवान विष्णु ने कुर्मा या कच्छपावतार लिया इसलिए कुमांऊ क्षेत्र को प्राचीन में कुर्मांचल के नाम से जाना जाता था। बाद में कुर्मांचल को ही कुमाँऊ कहा गया।

§  पुराणों मेंमानसखंड’  केदारखंड के संयुक्त क्षेत्र को – उत्तर खंड, ब्रह्मपुर एवं खसदेश नामों से संबोधित किया है।

ब्रह्मपुराण, वायुपुराण

§  ब्रह्मपुराण वायुपुराण के अनुसार कुमाँऊ क्षेत्र में किरात, किन्नर, यक्ष, गंधर्व, नाग आदि जातियों का निवास था।

महाभारत

§  महाभारत के वनपर्व में हरिद्वार से केदारनाथ तक के क्षेत्रों का वर्णन मिलता है उस समय इस क्षेत्र में पुलिंद किरात जातियों का अधिपत्य था।

§  पुलिंद राजा सुबाहु जिसने पांडवों की और से युद्ध में भाग लिया था कि राजधानी श्रीनगर थी।

§  महाभारत के वनपर्व में लोमश ऋषि के साथ पांडवों के इस क्षेत्र में आने का उल्लेख है।

§  आदि पर्व में उल्लेख – अर्जुन उल्लुपी का विवाह गंगाद्वार में हुआ था।

रामायण

§  टिहरी गढ़वाल की हिमयाण पट्टी में विसोन नामक पर्वत पर वशिष्ठ गुफावशिष्ठ आश्रम, एवं वशिष्ठ कुंड स्थित है।

§  श्री राम के वनवास जाने पर वशिष्ठ मुनि ने अपनी पत्नी अरुंधति के साथ यहीं निवास किया था।

§  तपोवन टिहरी गढ़वाल जिले में स्थित है जहां लक्ष्मण ने तपस्या की थी।

§  पौड़ी गढ़वाल के कोट विकासखंड में सितोन्सयूं नामक स्थान है इस स्थान पर माता सीता पृथ्वी में समायी थी। इसी कारण कोट ब्लॉक में प्रत्येक वर्ष मनसार मेला लगता है।

§  रामायणकालीन बाणासुर का भी राज्य गढ़वाल क्षेत्र में था और इसकी राजधानी ज्योतिषपुर (जोशीमठ) थी।

अभिज्ञान शंकुतलम

§  अभिज्ञान शंकुतलम की रचना कालिदास ने की।

§  प्राचीन काल में उत्तराखंड में दो विद्यापीठ थे बद्रिकाश्रम एवं कण्वाश्रम

§  कण्वाश्रम उत्तराखंड के कोटद्वार से 14 km दूर हेमकूट मणिकूट पर्वतों की गोद मे स्थित है।

§  कण्वाश्रम में दुष्यंत शकुंतला का प्रेम प्रसंग जुड़ा है शकुंतला ऋषि विश्वामित्र तथा स्वर्ग की अप्सरा, मेनका की पुत्री थी।

§  शकुंतला दुष्यंत का एक पुत्र हुआ भरत जिनके नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा।

§  इसी कण्वाश्रम में कालिदास ने अभिज्ञान शाकुंतलम की रचना की।

§  कण्वाश्रम मालिनी नदी के तट पर स्थित है।

§  वर्तमान में यह स्थान चौकाघाट के नाम से जाना जाता है।

मेघदूत

§  कालिदास द्वारा रचित मेघदूत के अनुसार अल्कापुरी (चमोली) कुबेर की राजधानी थी।

बौद्ध ग्रंथ

§  पाली भाषा के बौद्ध ग्रंथों में उत्तराखंड को हिमवंत कहा गया है।

अन्य

§  इतिहासकार हरीराम धस्माना, भजन सिंह, शिवांगी नौटियाल के अनुसार ऋग्वेद में सप्तसैंधव प्रदेश वर्तमान गढ़वाल ही था।

§  चमोली के निकट स्थित नारायण गुफा, व्यास गुफा, मुचकुंद गुफाओं में वेदों की रचना वादरायण या वेदव्यास ने की थी।

§  पुराणों के अनुसार मनु का निवास स्थान तथा कुबेर की राजधानी अलकापुरी (फूलों की घाटी) को माना जाता है।

§  ब्रह्मा के मानस पुत्रों दक्ष, मरीचि, पुलस्त्य, पुलह, ऋतु और अत्रि का निवास स्थान गढ़वाल ही था।

§  बाणभट्ट की पुस्तक हर्षचरित में भी इस क्षेत्र की यात्रा पर आने-जाने वाले लोगों का उल्लेख मिलता है।

§  कल्हण की पुस्तक राजतरंगिणी में कश्मीर के शासक ललितादित्तय मुक्तापीड़ द्वारा गढ़वाल विजय का उल्लेख मिलता है।

§  जोशीमठ से प्राप्त हस्तलिखित ग्रन्थ गुरूपादुक’ में अनेक शासक और वंशो का उल्लेख प्राप्त होता है।

विदेशी साहित्य

§  हर्षवर्धन के शासनकाल में ही चीनी यात्री ह्वेनसांग उत्तराखण्ड राज्य की यात्रा पर आया था, उसने अपने यात्रा वृतांत में हरिद्वार का उल्लेख ‘मो-यू-लो’ नाम से एवं हिमालय का ‘पो-लि-हि-मो-यू-ला’ अथवा ब्रह्मपुर राज्य के नाम से किया है।

§  चीनी यात्री युवान-च्वांड (ह्वेनसांग) ने सातवीं सदी में अपने यात्रा वृतांत में उत्तराखंड के विभिन्न शहरों का वर्णन किया है

§  ब्रह्मपुरउत्तराखंड

§  शत्रुघ्न नगरउत्तरकाशी

§  गोविपाषाणकाशीपुर

§  सुधनगरकालसी

§  तिकसेनमुनस्यारी

§  बख्शीनानकमत्ता

§  ग्रास्टीनगंजटनकपुर

§  मो-यू-लोहरिद्वार

§  मुगल काल में आए पुर्तगाली यात्री जेसुएट पादरी अन्तोनियो दे अन्द्रोदे 1624 में श्री नगर पंहुचा उस समय यहां का शासक श्यामशाह था।

§  तेमुर की आत्मकथा मुलुफात--तिमुरी के अनुसार गंगाद्वार के निकट युद्ध करने वाले शासक

§  बहरुज (कुटिला/कपिला राजा)

§  रतन सेन (सिरमौर का राजा)

§  फ्रांसिस बर्नियर ने हरिद्वार को शिव की राजधानी के रूप में उल्लेख किया है।

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